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नर्मदा परिक्रमा का विशेष रिपोर्टिंग दिल्ली बुलेटिन के पाठकों के लिए, शिव प्रिय मैंकल शैल सुतासि, सकलसिद्ध सुख संपति राशि ….

पहला किश्त

भारत नदियों का देश है। प्रमुख नदियों का अपना विशेष महत्व है। प्रतिवर्ष हजारों की संख्या में साधू सन्यासी और गृहस्थजन कठिन कष्ट उठाकर मां नर्मदा की परिक्रमा करते हैं। परिक्रमा आदी काल से की जा रही है। पहले साधू संत लोग ही परिक्रमा करते थे। परिक्रमा के मार्ग में घनघोर जंगल, पहाड़ का दुर्गम मार्ग था। समय के साथ साथ परिक्रमा मार्ग तय हो गया। पूरा परिक्रमा एक हजार तीन सौ बारह किलोमीटर का है। जिसे पैदल चलकर पूरा करना होता है। कहा जाता था कि यह परिक्रमा तीन वर्ष, तीन माह और तेरह दिनों में पूर्ण होती है लेकिन अब यह मार्ग सुगम हो जाने के कारण इसे 108 दिनों में पूरी कर ली जाती है। ‘न जानामि योगम् जपं नयव पूजन’ के भाव से यह परिक्रमा अरपा उद्गम बचाव संघर्ष समिति पेंड्रा छत्तीसगढ़ केे संयोजक अक्षय नामदेव और उनके परिजनों ने की है। नर्मदा परिक्रमा वासी के रूप में मां नर्मदा के तट पर जो अनुभव मिला उसे दिल्ली बुलेटिन के पाठकों को दिया जा रहा है।

भारत नदियों का देश है। यहां की नदियां यहां की संस्कृति एवं सभ्यता का परिचायक है। भारत में नदियों को मां का दर्जा प्राप्त है यहां नदियों का जितना प्राकृतिक एवं भौगोलिक महत्व है उतना ही अधिक आध्यात्मिक। नदियों के उद्गम, संगम तथा पूरी नदी के तट को तीर्थ माना जाता है। विशेष पर्वो पर नदियों के उद्गम, तट, संगम पर स्नान, ध्यान, दान, भोग भंडारा के अलावा मेले की परंपरा है। नदियों के किनारे घाट का निर्माण, मंदिर का निर्माण, नदी के जल का पान एवं स्नान पुण्य दाई माना गया है। नदी के नाम का स्मरण करने से ही जन्म जन्मांतर के पाप नष्ट हो जाते हैं। यही कारण है कि हमारे सनातन धर्म में नदियों के तट पर कुंभ मेले की भी परंपरा चल रही है। नदियों ने हमेशा से मानव जाति को अपनी और आकर्षित किया है। जल ही जीवन है इसलिए नदियों को जीवनदायिनी कहा गया है। बड़े-बड़े  महानगर, नगर, कस्बे गांव नदियों के किनारे ही बसे हैं।

भारतवर्ष की प्रमुख 7 नदियां गंगा, यमुना, सरस्वती, गोदावरी, महानदी, कावेरी एवं नर्मदा है। जिसमें मां नर्मदा नदी को सब नदियों में श्रेष्ठ माना गया है। मां नर्मदा ही एकमात्र  ऐसी नदी है जिसकी परिक्रमा हर साल हजारों नर नारी भक्ति भाव के साथ करते हैं। नर्मदा महात्म्य में कहा गया है कि गंगा के पान, और यमुना के स्नान से जो पुण्य फल, मोक्ष की प्राप्ति होती है वह पुण्य फल और मोक्ष मां नर्मदा के जल के दर्शन मात्र से प्राप्त होता है। कनखल में मां गंगा, कुरुक्षेत्र में मां सरस्वती का जल पवित्र माना गया है परंतु मां नर्मदा का जल का दर्शन पूरे बहाव क्षेत्र में पुण्य दाई है। कितने ही ऋषि मनीषियों ने मां नर्मदा के तट पर तपस्या कर सिद्धि प्राप्त की है। कितने ही कवियों साहित्यकारों ने इसके तट पर साहित्य साधना की है।मां नर्मदा का कंकर कंकर शंकर है अर्थात नर्मदा में पाया जाने वाला प्रत्येक पत्थर साक्षात भगवान शिव है। यही कारण है कि लोग कठिन तपस्या करते हुए कष्ट सहते हुए मां नर्मदा की परिक्रमा करते हैं। यह परिक्रमा कई तरह से की जाती है परंतु सबसे अच्छी परिक्रमा पैदल होती है जिसमें दोनों तट मिलाकर लगभग 3000 किलोमीटर की पदयात्रा होती है जो लगभग 3 साल 3 महीना 13 दिन में पूरी होती है और इस दौरान लगभग नर्मदा तट घाट पर स्थित 300 पवित्र तीर्थ स्थलों  का दर्शन प्राप्त होता है। मां नर्मदा परिक्रमा के नियम वैसे तो बहुत कठिन है जिसमें सत्य एवं ब्रह्मचर्य का पालन, पंच केस बढ़ाना, व्यर्थ वाद विवाद ना करना, एक बार भोजन, मितव्ययिता,आकाश वृति जैसे नियमों का पालन करते हुए परिक्रमा मार्ग में मिलने वाले साधु संतों का दर्शन सत्संग के साथ सुबह शाम मां नर्मदा जी की आरती, चतुर्मास नवरात्रि एकादशी पूर्णिमा अमस्या आदि पर्व पर एक स्थान में रुक कर जप तप करना चाहिए। मां नर्मदा के प्रति भक्ति और वैराग के भाव से प्रतिवर्ष हजारों नर नारी संकल्प लेकर मां नर्मदा की परिक्रमा करते हैं तथा मां नर्मदा उन्हें अपने बच्चे की तरह अपने आंचल में सुरक्षित, खुशहाल रखते हुए अपनी भक्ति देते हुए अपनी परिक्रमा पूर्ण कराती है। मां नर्मदा की परिक्रमा करने वाले भक्तों को अपने अपने भाव के अनुसार अनुभूति प्राप्त होती है। उत्साही भक्त मां नर्मदा की परिक्रमा 6 माह और साल भर में भी पैदल कर लेते हैं।कालांतर में अपनी अपनी स्थिति परिस्थितियों के अनुसार मां नर्मदा के भक्त अब साइकल,स्कूटर, मोटरसाइकिल एवं अन्य वाहनों से भी व्यक्तिगत एवं सामूहिक रूप से मां नर्मदा की परिक्रमा कर लेते हैं।

” न जानामि योगम ,जपं नैव पूजन ” के बावजूद मां नर्मदा के प्रति मेरे एवं मेरे परिवार की बड़ी आस्था रही है। नर्मदांचल में जन्म लेने के कारण बचपन से ही अमरकंटक जाकर मां नर्मदा के दर्शन लाभ मिलता रहा। वे दिन भी याद है जब अमरकंटक आने जाने के लिए साधन नहीं के बराबर थे। गौरेला से अमरकंटक जाना अत्यंत कठिन था। आने जाने के साधन के रूप में एक बस ही बमुश्किल चलती थी और बस ना मिली ,जगह ना मिली तो बॉक्साइट वाले ट्रक में ही आना जाना पड़ता था। बचपन की कितनी ही धुंधली यादें है जब बस में भीड़ होने के कारण पिताजी ने गोद में उठाकर बस की खिड़की से बस में बैठा दिया था। बॉक्साइट से भरी एवं खाली  ट्रक से चढ़ना उतरना और फिर पैदल मां नर्मदा के कुंड तक जाना और मां नर्मदा में स्नान करना फिर रामघाट में भोजन बनने तक इंतजार करना और उससे प्राप्त सुख और उपजी भक्ति का वर्णन करना कठिन है पता ही नहीं चला की मां नर्मदा कैसे रोम रोम में समा गई ? अपनी मां नर्मदा की परिक्रमा के बारे में लिख रहा हूं और दादा भाई का स्मरण ना करूं तो पाप का भागीदार होऊंगा। दरअसल वर्ष 1981 के आसपास मेरे दादाजी स्वर्गीय राम सहाय नामदेव जी गौरेला जिन्हें हमारे परिवार में सभी दादा भाई से संबोधित करते थे ने भी मां नर्मदा की 3 साल 3 महीने 13 दिन वाली कठिन परिक्रमा पैदल की थी। दादाभाई को गौरेला में उनके चाहने वाले स्नेह और सम्मान से “भगत जी “कहते थे। दादाभाई अपने दिनों में कटपीस कपड़े का व्यवसाय करते थे। वे सीधे बंबई से कटपीस लाते और यहां व्यापारियों को दे देते थे परंतु स्वभाव से वह बैरागी थे। कारोबार से जो समय मिलता उसका उपयोग वे अमरकंटक जाने के लिए गौरेला रेलवे स्टेशन में उतरने वाले साधू सन्यासियों एवं परिक्रमा वासियों की सेवा में करते थे। दादा भाई का ज्यादा समय कमानिया गेट स्थित शंकर मंदिर में ही कटता था। बड़ी संख्या में परिक्रमा वासी एवं साधु सन्यासी शंकर मंदिर कमानिया गेट में ठहरते थे। बारिश के समय अमरकंटक जाने के लिए कई कई दिन साधन नहीं मिलते थे ऐसे में साधु सन्यासी एवं परिक्रमावासियों की भोजन ,शयन की सेवा कैसे अच्छे से अच्छी हो इसके लिए दादा भाई अपने शुभचिंतकों और मित्रों को जोड़ लेते थे उनके नेतृत्व में एक बड़ी मंडली थी जिनके साथ वे सेवा का यह पुण्य कार्य लंबे समय से जीवन पर्यंत  करते रहे। अमरकंटक पहुंचने वाले साधू सन्यासियों एवं परिक्रमा वासियों के प्रति उनका यह सेवा कार्य मैंने बचपन से ही अपनी आंखों से देखा है जो अब भी आंखों में झूलता है।

नर्मदा,सोन,अरपा, तान, तिपान, बम्हनी, जोहिला, मलानिया, एलान जैसी नदियों का उद्गम क्षेत्र नर्मदांचल साल वनों से आच्छादित रहने के कारण प्राकृतिक रूप से खूबसूरत एवं समृद्ध है तथा इस अंचल की पहचान है। वर्ष 2016 के आसपास जब अरपा नदी पेंड्रा के उद्गम को पाटा गया और उसकी प्लाटिंग कर जब उसकी बिक्री की गई तब स्वाभाविक रूप से नदियों के तरफ ध्यान आकृष्ट हुआ।

अरे!  यह क्या हो रहा है? तमाम तरह के संघर्ष कोर्ट, कचहरी, आरोप-प्रत्यारोप शिकायत बाजी के बीच स्वाभाविक रूप से अरपा उद्गम की रक्षा के लिए ईश्वरीय मदद की जरूरत महसूस हुई। मन में सवाल भी आया कि क्या हमारी लड़ाई सही दिशा में है? और इसका ठीक जवाब मुझे तब मिला जब  मां नर्मदा की प्रेरणा से ही  मई 2019 में पत्नी निरुपमा एवं बेटी मैंकला के साथ चार धाम की यात्रा में  उत्तराखंड जाने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। उस चार धाम की यात्रा ने मेरी चेतना को जगाने का काम किया। मां गंगा नदी के उद्गम स्थल गंगोत्री और यमुना नदी के उद्गम स्थल यमुनोत्री की कष्टप्रद ,कठिनाई भरी यात्रा लोग जान हथेली पर  लेकर जिस तरह श्रद्धा और भक्ति के साथ करते हैं वह अद्भुत है ।इस यात्रा के दौरान हमारी अरपा उद्गम के प्रति आस्था और भी ज्यादा पुष्ट हुई और हमें अरपा उद्गम पेंड्रा को बचाने के लिए संघर्ष संघर्ष करने की ताकत मिली।उत्तराखंड के चार धाम यात्रा यमुनोत्री, केदारनाथ, गंगोत्री, बद्रीनाथ दर्शन के लिए हमारेअरपा उद्गम बचाओ संघर्ष समिति पेंड्रा के दल में साथ गई हमारी चाची श्रीमती लीला बिसेन ने यात्रा के दौरान मुझसे कहा नन्हा (मेरा घरेलू नाम) आगे उनकी इच्छा नर्मदा परिक्रमा करने की है ।तो मैंने भी उनकी हां में हां मिलाते हुए कहा कि हां चाची यदि अवसर मिलेगा तो मैं भी जरूर नर्मदा परिक्रमा में जाना चाहूंगा। इस तरह हमारी मां नर्मदा परिक्रमा करने की योजना वर्ष 2019 मई में चार धाम यात्रा के दौरान ही बन गई थी।

हर हर नर्मदे

                            क्रमश:

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