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कुछ रहम खुदा कुछ रहम खुदा …

कुछ कहानियां अनसुनी नहीं

चीख रही है अतरमन में वहीं

मौन हूं आज पर देख सब रही

सब्र नहीं हो रहा दिल से आह निकल रही

ये कौन से जन्म का कर्म का इतिहास रच रहा हैं

किसी की काली परछाई या नज़र लग रही

सुना है मां नज़र उतार देती

अब पैदा होते ही खींच रूह को

कंपकंपा अंधेरे में एक नन्नी ही जान रही

हार जीत की लड़ाई थी जन्म दिया बेइमतः दर्द से सहती

अब वो हिसाब कर्ज़ का कैसे चुकायू मां

तेरी गोद तेरे प्यार तेरे दुलार तेरे दूध का कर्ज से मुक्ति का एहसास कराती

तिल तिल दुनिया की चिक्की में लावारिस छोड़ गई

कभी किसी मां में अपने बच्चे को खो दिया दिल दहलती गई

हर बार रोटी को लेकर खुद भी भूखी ही सो जाती

हर हाल को बिना जाने समझ जाती

अब अपनी सुनी गोद को देख कर हर बार तड़पती

रहमत बख़्श खुदा इस कदर हावी हुई माहमारी

अब तो समक्ष बन जाओ एक सुई चुभने की चुभन महसूस करनी है

नहीं सह पाओगे अपनो को अछूतो की तरह रेत की तरह निकल ते जाते देखती

निगाहें पथराई हो गई अब बर्दश नहीं

कुछ रहम खुदा कुछ रहम खुदा

© हर्षिता दावर, नई दिल्ली                                             

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