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अकेली बेटियाँ …

मां के बिना बेटियाँ सहरा की दरख्त हैं

खासकर अकेली बेटियाँ,

इस कदर मौन मानो सितार

इस कदर एकांत से भरी मानो सुरंग ,

निरंतर बर्दाश्त से सख्त जान ये

रेतीली आंधियों में जीना सीख लेती हैं

मन को सीना सीख लेती हैं ,

स्मृतियों के जल से सीझी

ये पीड़ा में भी फूल खिला सकती हैं

मन के ताप से बादलों को पिघला सकती हैं

और तो और ये समूचा ब्रह्मांड खुद में समो सकती हैं

और मुस्कुरा सकती हैं,

इनकी आँखों में झांकना मना है

कुछ पड जाता है

जिसे निकालते निकालते ये एक पूरा समंदर सोख लेती हैं

बिना जताये ये खुद को नमक कर लेती हैं

इनका मन डूबती कश्ती सा हो जाता है,

ये सबका कहा मान जाती हैं

जिद्द, मनुहार और लाड दुलार की अपनी आदतों को

सुधार लेती हैं

ये कभी कोई कंधा नहीं तलाशतीं क्षण भर के चैन को

ये अपने दुख और शिकायतों को किसी से नहीं कहतीं

चुपचाप पी जाती हैं,

अकेली बेटियाँ सीपियों सी हो जाती हैं।

 

 

©अर्चना राज चौबे, नागपुर महाराष्ट्र

परिचय : जन्म स्थान सोनभद्र उत्तरप्रदेश, काशी हिन्दू विश्ववद्यालय से स्नातक, तीन पुस्तकें प्रकाशित, एहसास का संपादन, विभिन्न पत्र –पत्रिकाओं में कविता कहानी लेख व आकाशवाणी नागपुर से नियमिम प्रसारण.

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