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श्री नरसिंह देव प्राकट्योत्सव ….

इस्कॉन फरीदाबाद में रविवार 15 मई को नरसिंह देव का प्राकट्य दिवस बहुत ही धूमधाम व हर्षोल्लास के साथ मनाया गया। भगवान विष्णु अपने पवित्र भक्त प्रह्लाद महाराज की रक्षा के लिए सतयुग में आधे मनुष्य और आधे सिंह के रूप में प्रकट हुए।

सतयुग में हिरण्यकश्यप नाम का एक बहुत शक्तिशाली राक्षस था। अपनी तपस्या के प्रभाव से उन्होंने भगवान ब्रह्मा को प्रसन्न किया और कई वरदान प्राप्त किए जिससे उन्हें किसी भी मनुष्य या जानवर द्वारा नहीं मारा जा सकता था, न दिन न रात में, न घर के अंदर न बाहर, न पृथ्वी पर न आकाश में, न ही किसी अस्त्र या शस्त्र से। इन वरदानों को प्राप्त करने के बाद वह बहुत शक्तिशाली हो गया और मनुष्यों और देवताओं को पीड़ा देने लगा। देवता बहुत भयभीत और निराश हो गए और सहायता के लिए भगवान विष्णु के पास गए।  भगवान ने उन्हें प्रकट होने और उनकी परेशानियों को दूर करने का वादा किया।

जब हिरण्यकश्यप तपस्या कर रहा था तो उसकी पत्नी जो अपने पुत्र को गर्भ में धारण किए हुई थी, उसे देवताओं ने पकड़ लिया और जब वह मारे जाने वाली थी तो नारद मुनि ने देवताओं को यह कहकर रोक दिया कि वह अपने गर्भ में एक बहुत ही शुद्ध भक्त को धारण किए हुए है। तब नारद मुनि उसे अपने आश्रम में ले गए और भक्ति योग सिखाया। गर्भ में पल रहे बच्चे ने सारी शिक्षाएं सुन लीं। जन्म के बाद उस बालक का नाम प्रह्लाद रखा गया और वे हरि, भगवान विष्णु के बहुत बड़े भक्त बन गए।

हिरण्यकश्यप जो विष्णु को अपना शत्रु मानता था, यह जानकर क्रोधित हो गया कि उसका पुत्र कृष्ण या विष्णु का भक्त है। इस प्रकार वह अपने पुत्र को पीड़ा देने लगा।  जब कुछ भी काम नहीं आया तो उसने कई तरह से उसे मारने की कोशिश की। लेकिन हर समय वह प्रभु द्वारा बचा लिया गया था।  अंत में भगवान विष्णु एक स्तंभ से नरसिंह के रूप में प्रकट हुए और सबसे शक्तिशाली हिरण्यकश्यप को मार डाला।

इस प्रकार भगवान यह साबित करते हैं कि वह अपने भक्तों से कितना प्यार करते हैं और हर समय उनकी रक्षा के लिए तैयार रहते हैं।

इस शुभ दिवस को मंदिर में कीर्तन, जप, कथा, अभिषेक और प्रसाद वितरण कर मनाया गया। विश्व में सुख, शांति व आनन्द के लिए मंदिर द्वारा एक विशेष पूजा अर्चना का आयोजन किया गया। जिसमें 100 से अधिक श्रद्धालुओं ने भाग लिया और 108 तुलसी के पत्ते को मंत्रोच्चारण के साथ श्रीकृष्ण के चरण कमलों में अर्पित किया गया। जो भगवान श्रीकृष्ण को अत्यंत ही प्रिय हैं।

मंदिर के अध्यक्ष गोपीश्वर दास ने कहा, “इस दिवस को भक्तगण बहुत उत्साह पूर्वक मनाते हैं और भगवान से प्रार्थना करते हैं कि जिस प्रकार उन्होंने हिरण्यकश्यप का अंत किया, ठीक उसी प्रकार हमारे अनर्थों को को भी नष्ट कर दें ताकि हम उनकी भक्ति में दृढ़ हो जाएं और इस प्रकार कृष्ण के प्रेम को प्राप्त करने के योग्य हो जाएं”।

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