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श्रावण, सोमवार और भगवान शिव की महिमा …

सनातन धर्म के सबसे पवित्र मास, श्रावण की शुरुआत हो चुकी है। इस बार श्रावण में कुल ४ सोमवार पड़ने हैं। भोले-भाले पालनहारे भगवान शिव के अत्यधिक प्रिय मास में श्रावण की गिनती होती है फलत: श्रावण में शिव आराधना पर विशेष बल दिया जाता है। इस महीने की अपनी संस्कृति है, अपना महत्व है। ज्येष्ठ माह के तपन और आषाढ़ माह की उमस भरी गर्मी से क्लान्त हमारी प्रकृति को एवम् धरती माँ को अमृत वर्षा की आवश्यकता होती हैं, जिसकी पूर्ति श्रावण मे ही संभव है। श्रावण महीने की सबसे बड़ी बात यह है कि इस महीने का हर दिन विशेष होता है हालांकि श्रवण नक्षत्र और सोमवार से भगवान भोलेनाथ का गहरा सम्बन्ध भी बताया जाता है। सनत्कुमार से श्रावण महीने की प्रियता को लेकर भगवान शिव खुद स्वीकारते हैं कि यही एक महीना है जो मुझे सभी महीनों से प्यारा है। इसी महीने मे भगवान शिव प्रभु नारायण के साथ लीला भी करते है। श्रावण में षडाक्षर, पंचाक्षर, शतरुद्री पाठ, महामृत्युन्जय मंत्र एवम् गायत्री मंत्र आदि के जप को विशेष माना गया है। श्रावण मास का महात्म्य सुनने अर्थात् श्रवण हो जाने के कारण इसका नाम श्रावण पड़ा। पूर्णिमा तिथि के श्रवण नक्षत्र से योग होने से भी इस माह का नाम श्रावण पड़ा। श्रावण मास व श्रवण नक्षत्र के स्वामी चन्द्र और चन्द्र के स्वामी भगवान भोलेनाथ है अर्थात् श्रावण मास के कर्ताधर्ता हमारे देवाधिदेव शिव ही है । अतः इस महीने सभी को पूरे मन से भगवान शिव की आराधना करनी चाहिए।

श्रावण मास में पूजा का महत्व एवम् फल इस प्रकार है—

श्रावण महीने मे एक माह तक जंगल में स्थापित शिवलिंग, शिवालय मे स्थापित शिवलिंग, प्राण प्रतिष्ठित शिवलिंग, पारा और चाँदी धातु से निर्मित पारद शिवलिंग अथवा नर्मदेश्वर शिवलिंग का जल, गंगाजल व गोदुग्ध से रुद्राभिषेक करना चाहिए यह हमारे भोलें शिव को अत्यन्त प्रिय हैं ।

रुद्राभिषेक के होने वाले अनेकानेक लाभ इस प्रकार है—

@ हमारे पौराणिक धर्म ग्रन्थों के अनुसार जल से अभिषेक करने पर भगवान शिव के आशिर्वाद के साथ ही साथ हर मनोकामना की पूर्ति होती है। अच्छी वर्षा होती है तथा सारे दुखों से छुटकारा मिलता है।

@ दुग्धाभिषेक करने से व्यक्ति को दीर्घायु की प्राप्ति होती है ।

@ पंचामृत से शिवलिंग का अभिषेक करने पर भक्त को धन और सफलता प्राप्त होती है ।

@ अखंड धन प्राप्ति व कर्ज मुक्ति के लिए भगवान भोलेनाथ का फलों के रस से अभिषेक करना चाहिए ।

@ कुशोदक से अभिषेक करने पर असाध्य रोग शांत होता है ।

@ भवन-वाहन की प्राप्ति के लिए दही से रुद्राभिषेक करें ।

@ लक्ष्मी प्राप्ति के लिए गन्ने के रस से अभिषेक करें ।

@ धनवृद्धि के लिए शहद व घी से अभिषेक करना चाहिऐ ।

@ तीर्थों के जल से जलाभिषेक करने से मोक्ष की प्राप्ति होती है ।

@ इत्र मिले जल से रुद्राभिषेक करने से बीमारी दूर होती है ।

@ पुत्र प्राप्ति के लिए दुग्ध से अभिषेक करना चाहिए ।

@ रुद्राभिषेक से योग्य तथा विद्वान संतान की प्राप्ति होती है ।

@ सरसो के तेल से अभिषेक करने पर शत्रु पराजित होता है ।

@ गोदुग्ध से तथा शुद्ध घी से अभिषेक करने पर आरोग्यता की प्राप्ति होती है ।

विशेष अवसरों पर जैसे सोमवार, प्रदोष और शिवरात्रि आदि पर्व के दिनो में केवल दुग्धाभिषेक भी किया जा सकता है। विशेष पूजा मे दुग्ध, दही, घृत, शहद और चीनी से अलग-अलग अथवा सबको मिलाकर पंचामृत से भी अभिषेक किया जा सकता है इस प्रकार विविध द्रव्यों से विधिवत रुद्राभिषेक करने पर अभिष्ट कामना की प्राप्ति होती है ।

शास्त्रों की माने तो किसी भी पुराने शिवलिंग का जलाभिषेक करने पर बहुत ही उत्तम फल की प्राप्ति होती है और यदि हम पारा और चाँदी से निर्मित अर्थात् पारद शिवलिंग का अभिषेक करे तो यथाशीघ्र चमत्कारी शुभ फल प्राप्त होता है। पारद शिवलिंग का हमारे धर्म ग्रन्थों में बहुत ही बखान किया गया है और इससे सम्बन्धित अनेकानेक कथाओं का विवरण भी प्राप्त होता है ।

शिवलिंग का रुद्राभिषेक देवों के देव महादेव को शीघ्रातिशीघ्र प्रसन्न करने के लिए किया जाता है । इसको करने पर भक्त, भगवान आशुतोष का कृपापात्र बन जाता है और उसके जीवन के सारे कष्ट अपने आप कट जाते हैं। अर्थात् इसको हम इस प्रकार भी कह सकते है कि भक्त के सारे पाप, ताप, क्लेश सब समाप्त हो जाते हैं ।

स्रृष्टि की रचना करने वाले ब्रम्हा ने स्वयं कहा है कि हम जब भी अभिषेक करते है तो भगवान् भोलेनाथ स्वयं उसको ग्रहण करते है। उनके अनुसार इस संसार में कोई भी सुख, धन, वैभव या वस्तु नहीं है जो हमें अभिषेक करने से प्राप्त न हो अर्थात् रुद्राभिषेक करने से सारे सुखों की प्राप्ति हमें हो सकती है ।

 

©संकलन पं.संतोष तिवारी शांडिल्य, मुंबई

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