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अल्पना सिंह की नई पुस्तक “तुम आये तो” की समीक्षा …

राम पंचाल भारतीय ने अल्पना सिंह की नई किताब पर अपनी प्रतिक्रिया दी है जिसे पाठकों के लिए हम यहां प्रकाशित कर रहे हैं। भाव मनुज के बदलते हैं, मन के बदलते हैं, किंतु भाव पुस्तकों के चिरस्थायी रहते हैं जो स्मृति पटल पर छप जाते हैं।

यही भाव प्रसूत हुए जब पता चला कि आपकी पुस्तक आई है, यकायक अल्पना ने मुझसे पता मांगा कि आपको मेरी हाल ही में प्रकाशित पुस्तक प्रेषित की जानी है। मैं तनिक भी देर न करते हुए पता लिखवाया। बस इसके बाद तो प्रतीक्षा कर रहा था कि कब पुस्तक हाथ में आये।

पुस्तक हाथों में थी पुस्तक का शीर्षक “तुम आये तो” इतना मोहक लगा कि पढ़ने की उत्कंठा थी मन में। पढ़ने का क्रम प्रारम्भ हुआ और पढ़ता गया…..।

पुस्तक में उनचास कविताओं का समावेश है और प्रत्येक का विषय बिल्कुल अलहदा…..जो आमतौर पर शायद ही देखने पढ़ने को मिले कहीं। जितने संजीदा विषय ठीक वैसे ही भावों का निरूपण कविताओं में स्पष्ट झलक रहा है। साथ ही प्रत्येक कविता अतुकांत जहाँ मुक्तिबोध सा कलेवर लिए व्याकरण  की सीमाओं से परे भावों का गुम्फ़न अत्यंत प्रभावी पुट लिए पुस्तक के प्राणों से प्रतीत हो रहा है।

जितनी संजीदगी से सृजन किया गया है निश्चित ही यह कल्पना से परे अल्पना सृजन मानव मन के साथ घटित अनुभवों का जागृत दस्तावेज है। जहाँ आरम्भ किया है “तुम्हारे इंतज़ार में हूँ” जिसमें अद्भुत बिंबों का प्रयोग कवयित्री की भाव प्रवणता को परिलक्षित करता है। भावगत प्रणयन में “प्यार नहीं प्रेम” यद्यपि दोनों शब्द परस्पर पर्याय हैं फिर भी अद्भुत अधिकार लिए गंभीरता से परिभाषित किया है जिसे पढ़कर सृष्टा की परिपक्वता का अनुमान सहज लगाया जा सकता है।

पुस्तक में समाहित किसी भी रचना को कमतर नहीं आंका जा सकता है। प्रत्येक कविता अपनी उन्मुक्त उड़ान तो कहीं भावों का विशाल गह्वर लिए है, जहाँ सामाजिक, मानसिक, आर्थिक, सांस्कृतिक, वैज्ञानिक, तकनीक के साथ मनोवैज्ञानिकता का समावेश बेजोड़ है। जहाँ पिता, दुःख, उनींदे चक्षुओं के सजग होते ही, उन्मुक्त, भ्रम, मनुष्यघर और अनभिज्ञ हूँ जैसी कविताएँ जिसकी विषयवस्तु नायाब है।

पोथी क्या है? भावों का पुलिंदा और आपके मन मस्तिष्क के भाव, सामाजिक और मानसिक चिंतन को बड़े सूक्ष्म तरीके से उकेरा है। पुस्तक का अदृश्य आत्मिक भाव जो मुझे देखने मिला, वह है स्त्री विमर्श जिसे सहज तरीके से कविता के भावों के साथ कब और कैसे बड़ी नफ़ासत से कह दिया और ठक्क सा लगा कलेजे पर, जिसे पाठक पढ़ने के बाद अनुभव करेगा। प्रणयन में विशिष्ट शब्दावली क्लिष्टता से मुक्त ग्राह्यता भाव पुस्तक के कलेवर को और सुंदर बनाता है। आमजन के लिए सीधे मन पर दस्तक देती कविताओं की  विश्वसनीयता कवयित्री की विलक्षण प्रतिभा की सूचक है।

यह लक्षण भग्न भवन, आत्म हत्या , फ़ोटो फ्रेम सरीखी कविताओं में स्पष्ट दृश्यमान है। कहीं-कहीं चित्रोपम शैली का प्रयोग चिंतन की पराकाष्ठा चाक्षुष उजागर करता है। पुस्तक में इनसे सीखा, मन की पीर, यादों में तुम्हारी और तुम आये तो पुस्तक की प्राण रचनाएं हैं जो शीर्षक को सार्थक कर रही है। अंततोगत्वा पोथी पठन के पश्चात कह सकते हैं कि पुस्तक लेखन-प्रकाशन में आपका श्रम निश्चित रूप से सुहृद पाठकगणों को चिंतन के द्वार तक पहुंचाएगा और अन्तस् को आनंदित करेगा।

मैं माँ मरालपृष्ठवाहिनी वागीशा से प्रार्थना करता हूँ कि आपकी कलम निरंतर इस दिशा में अधिक भावगांभीर्य लिए अहर्निश गतिमान हो अक्षर ब्रह्म आराधन करती रहें। स्त्री विमर्श, स्त्री के मनोभावों के साथ जीवन के पहलुओं पर सकारात्मक सृष्टि-दृष्टि से उकेरती रहें।

अस्तु।

पुस्तक प्रकाशन हेतु बधाई एवं प्रेषण हेतु धन्यवाद ज्ञापित करता हूँ।

 

राम पंचाल भारतीय

पांचलवासा, जिला बाँसवाड़ा (राज.)

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