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असलियत …

बात  इधर  उधर  तो   बहुत  घुमाई जा  सकती है

पर सच्चाई  भला  कब तक  छुपाई  जा सकती है

 

खून से बना  कर   मां   बच्चे   को जो  पिलाती है

उस  दूध की कीमत  कैसे   चुकाई  जा सकती  है

 

सहरा   की   प्यास   तो  समंदर   बुझा  सकता  है

पर समंदर  की प्यास  कैसे  बुझाई  जा सकती  है

 

नहीं   हल  निकलता   गर   तोप  और   बंदूक   से

लड़ाई   प्यार  से  भी  तो  सुलझाई जा  सकती  है

 

खींच  दी   है   दिलों   में   गर   दीवार   मजहब  ने

उसमें कोई  खिड़की भी तो  बनाई  जा  सकती  है

 

किसी बेबस पे ज़ुल्म देख गर कुछ कर नहीं सकते

तो शर्म  से  यह   गर्दन  तो   झुकाई   जा सकती है

 

मुश्किल  है  लड़ना  गर अकेले    किसी  बुराई  से

उसके  खिलाफ़ मुहिम भी तो चलाई जा सकती है

 

दुनिया  भर  के  वैद्य  जब बेबसी  से  हाथ जोड़ दें

तो दुआ की ताकत भी तो  आजमाई जा सकती है

 

अपनी  असलियत  तो  दौलत  से छुपा लेगा  कोई

पर   औकात  भला कब तक छुपाई  जा सकती है

 

राह  मुश्किल  होती  है  ज़रा   वक़्त  लग  जाता  है

दौलत तो  ईमानदारी   से  भी कमाई जा  सकती है

 

चलो   मान   लिया  हमने   कि  ” राज ” बेगुनाह  है

पर उस पर कोई तोहमत  तो  लगाई  जा  सकती है

 

©ऋषिकेश चौहान, हरदीबाजार, कोरबा      

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