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रहिमन धागा प्रेम का मत तोड़ो चटकाए …

 

अजीब सा विरोधाभाष है “विश्वास” एक बहुत पक्की और मजबूत डोर होती है और इतनी कमजोर जो अविश्वास या शक की बोथी सी धार से बुरी तरह टूट जाती है और एक बार यह टूटी की इन्सान कितनी भी कोशिश करले पुनः शक की लालिमा लिए ही जुड़ती है … और यह डोर जब एक लम्बे विश्वास के बाद टूटती है तो उसका कष्ट सबसे ज्यादा होता है … विश्वास गड़ना एक खड़ी चोटी पर भारी पत्थर को अथक प्रयास और मेहनत से चोटी तक पहुँचाना होता है … जिसे आप अपनी ईमानदारी अपना प्रेम अपना स्नेह अपनी लगन के सहारे लगा लगा कर चोटी तक पहुंचाते है …. और वो चोटी भी समतल नहीं होती त-उम्र आप उस चोटी पर विश्वास की उस चट्टान को संतुलित करने प्रयास करते रहते है … क्योंकि उस चोटी के दूसरी ओर फिर सीधी ढलान है … एक बार आपका मस्तिक आश्वत हुआ और वो चट्टान उस ढलान से कई गुणा तेजी से नीचे लुडकती है … क्या विश्वास कभी भी जम कर ना रहने वाली चीज है … या यह जो है विश्वास है आखिर है कौन सी बला आप सुबह अपने बच्चे से बोल कर निकलते है की शाम को उसके लिए आईसक्रीम लायेंगे ना ला पाए तो बच्चे का आप पर से विश्वास टूट गया कई सालो के प्रेम के बाद अचानक आपका साथी आपके फोन आपकी डायरी में तांक झांक करे और अजीब सी नज़रों से आपको देखे तो क्या विश्वास टूट गया और वो प्रेम उस समय कहाँ गया जो विशुद्ध रूप से, पूरी ईमानदारी से आपका साथी आपसे इतने वर्षों से पा रहा था … अति सर्वता वर्जते ऋषि मुनि कह गये है प्रेम, क्रोध, लोभ, माया, घ्यान, योग, स्नेह, और विश्वास भी क्या इस शूक्ति की ज़द में आते है ….. मुझे नहीं पता मानव संवेदनाओं को समझना निश्चित तौर पर एक जटिल कार्य है आप यदि इसे समझने की कोशिश में लगे तो खुद इतना उलझेंगे की सुलझना मुश्किल होगा … ।

 

एक गीत की पंक्तियाँ यूँ ही याद आ रही है…

 

कोई भी हो हर ख़्वाब तो अच्छा नहीं होता

बहुत ज्यादा प्यार भी अच्छा नहीं होता है

कभी दामन छुड़ाना हो, तो मुश्किल हो

प्यार के रस्ते छूटे तो, प्यार के रिश्ते टूटे तो

ज़िंदगी भर फिर वफ़ाएं पीछा करती हैं

 

 कभी देखा कोई ऐसा पेड़ जिसकी जड़ें न हो ? कभी देखा ऐसा कोई भवन जिसकी नींव न हो? विज्ञान की ऐसी कोई खोज जिसमें कल्पना न हो? ऐसा कोई रिश्ता जिसमें कोई भावना न हो? ऐसा कोई धर्म जिसमे आस्था न हो ? नहीं न??

तात्पर्य ये कि हर बात, हर चीज, हर सफलता, हर रिश्ता, हर धर्म का कोई न कोई आधार/मूल/कारण होता है।

 एक बार इस तरह सोचकर देखिए, अगर जड़ को नुकसान हो तो पेड़ पनपेगा? नीव कमजोर हो तो इमारत बुलंद होगी ? कल्पना या अनुमान लगाए बिना विज्ञान कोई नई खोज कर पाएगा? भावनात्मक जुड़ाव के बिना कोई रिश्ता निभ पाएगा? आस्था डगमगाई तो धर्म टिक पाएगा??

शायद नहीं,…

मुझे लगता है,… प्रेम एक शाश्वत अनुभूति है अंतर्मन की, जिसका आधार ‘विश्वास’। विश्वास की परिणीति ‘समर्पण’ जो प्रेम को सार्थक करता है। जहां ठेस विश्वास को पहुंची या शक का कीड़ा पनप गया रिश्तों के धागों का उलझना तय है। और बहुत नाजुक सी डोर होती है प्रेम की,..।

 सुलझाते सुलझाते अकसर टूट जाती है। और मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है जिसका अकेले जीना संभव नही, रिश्तों में जोड़ लगाता ही चला जाता है। पर जहाँ एक गांठ लगी रिश्ते का मौलिक स्वरूप खत्म,…।

 

प्रेम कभी नहीं मरता इसलिए रिश्ते में प्रेम जस का तस बना रहता है। अपेक्षाएं रिश्ते की जरूरत है वो भी बनी रहती है कम या ज्यादा परिस्थितियों के अनुरूप। पर विश्वास टूटकर जब जुड़ता है तो पूरा कभी नहीं होता। विश्वास में लगी चोट के बाद समर्पण तन-मन-धन से हो सकता है पर आत्मा में कहीं एक असुरक्षा का भाव घर कर ही जाता है। और जहाँ विश्वास और समर्पण कमजोर हुए वहाँ प्रेम का पूर्ववत स्वरूप लौट पाना संभव ही नही।

इसी बात को चरितार्थ करता है रहीम का ये दोहा…

 

“रहिमन धागा प्रेम का, मत तोड़ो चटकाय।

टूटे से फिर ना जुड़े, जुड़े गाँठ परि जाय”॥

 

 

 

कहने का तात्पर्य यह है कि टूटकर जुड़े संबंधों में पूर्ववत् मधुरता नहीं रह जाती बल्कि अविश्वास का काँटा मन में गढ़ा रह जाता है। अतः जहाँ तक हो सके यत्न यही करना चाहिए कि संबंधों में खटास न आने पाए। अपने अहं को दरकिनार करके, मन को मारकर रूठे हुओं को मना लेना चाहिए। इससे जीवन में कभी पश्चाताप नहीं करना पड़ता।

 

छोटी-छोटी बातों को अपने अहं के कारण तूल नहीं देनी चाहिए और न ही एक-दूसरे से नाराज होकर अपने संबंधों को दाँव पर लगाना चाहिए। भावावेश में आकर सम्बन्ध-विच्छेद करने पर उनमें जुड़ाव कठिन हो जाता है। यदि उन्हें पुनः जोड़ने का प्रयास किया जाए तो मन में कसक रह जाती है। इससे पारिवारिक व सामाजिक जीवन में प्रेम पुल का कार्य करता है। जहाँ यह पुल टूटा वहीं पारिवारिक विघटन की सम्भावना बढ़ जाती है। ये रिश्ते जितना हमारा सम्बल बनते हैं, उतने ही नाजुक भी होते हैं। बड़ी सूझबूझ से इनको निभाना होता है। जहाँ जरा-सी लापरवाही हुई, इनमें दरार आने लगती है। रिश्तों के विषय में कहा जाता है कि वे कच्चे धागों से बन्धे होते हैं। कितने सुन्दर शब्दों में इसी भाव को निम्नलिखित दोहे में रहीम ने समझाया है…

 

 ” रूठे सुजन मनाइए जो रूठें सौ बार।

 रहिमन फिर फिर पोइए टूटे मुक्ताहार”॥

 

अर्थात् रूठे हुए सुजनों को बार-बार मना लेना चाहिए। जिस प्रकार मोतियों की माला टूट जाने पर उसे बार-बार पिरो लिया जाता है।

 

आज रिश्तों में पारदर्शिता न होकर स्वार्थ हावी हो रहा है।भौतिक युग में धन प्रधान होता जा रहा है। नजदीकी रिश्तों को भी स्वार्थ के तराजू में तौला जाता है। जब तक स्वार्थों की पूर्ति होती रहती है तब तक संबंध बने रहते हैं। ऐसे स्वार्थपरक संबंध लम्बे समय तक नहीं चलते। स्वार्थ की पूर्ति होते ही उनमें आपसी सौहार्द समाप्त होने लगता है।

सभी रिश्ते अपने-आप में बहुत महत्त्वपूर्ण होते हैं। परिवार, बन्धु-बान्धव, मित्र और पड़ोसी सभी को हम प्रेम से अपना बना सकते हैं। और तो और शेर जैसे खूँखार जीव को भी अपने वश में कर सकते हैं। समाज के उपेक्षित वर्ग में भी यदि हम प्यार बाँट सकें तो वे भी हमारा साथ नहीं छोड़ेंगे। कबीर दास ने बड़े सुन्दर शब्दों में प्रेम की व्याख्या करते हुए कहा है–

 

 “पोथी पढ़ि-पढ़ि जग मुआ पण्डित भया न कोय।

 ढाई आखर प्रेम के पढ़ै सो पण्डित होय”॥

 

अर्थात् महान ग्रन्थों को पढ़ने से कोई विद्वान नहीं बन जाता। प्यार शब्द के अढ़ाई अक्षर पड़ने से मनुष्य पण्डित बनता है।

 

ईश्वर भी हमसे प्रेम की अपेक्षा रखता है। जो संसार को पैदा करता है वह मनुष्य को सभी नेमतें देता है, उसे हमसे कुछ भी नहीं चाहिए। पर वह यह भी नहीं चाहता कि उसकी बनाई सृष्टि में हम नफरत फैलाएँ। प्रेम के कारण ही भगवान राम ने शबरी के झूठे बेर खाए। भगवान कृष्ण ने दुर्योधन के राजसी भोग छोड़कर विदुर के घर शाक खाया। धन्ने जाट को प्रभु ने प्रत्यक्ष दर्शन दिए। अनन्य प्रेम होने पर मनुष्य ईश्वर का प्रिय बनता है तथा रोग-शोक से मुक्त हो जाता है। फिर जन्म-मरण के बन्धनों से मुक्त होकर मोक्ष प्राप्त करता है।

 

सोचिये एक बार कहीं जाने अनजाने हम अपने रिश्तों को तोलमोल कर कमजोर तो नहीं कर रहे। यदि प्रेम है तो विश्वास पूरा हो क्योंकि मेरा मानना है कि विश्वास कभी कम या ज्यादा नहीं होता। विश्वास की कमी का अर्थ अविश्वास ही होता है और कुछ भी नही। समर्पण की अपेक्षा है या समर्पित होने का भाव मन मे है तो शर्त सिर्फ एक कि विश्वास पूरा हो। टूटे विश्वास को जोड़कर प्रेम को बनाए रखना जोड़ वाले धागे की तरह ही रिश्तों को रफ़ू करने के काम तो आएगा पर सौदर्य और मजबूती खो बैठेगा।

 

भरोसा पूरा हो तो मजबूत आधार होगा।

सच्चे प्रेम का हर सपना साकार होगा।

संशय प्रश्न और जिरह की गिरहें मत रखना,

रिश्ते की पोशाक का सुंदर आकार होगा।

©रीमा मिश्रा, आसनसोल (पश्चिम बंगाल)

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