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साठ साल की कथा यात्रा में कुछ खोया-पाया नहि, जो है उसे पहेचाना है: मोरारि बापु

मानस अतिथि देवो भव।। दिन-२ दिनांक-२४ जुलाई

प्रतीक्षा ही परमात्मा है।।

अतिथि प्रिय, पूज्य, प्राप्य, पवित्र और परम करुणामयी होना चाहिये।।

 

अगरतला त्रिपुरा से बह रही रामकथा के दूसरे दिन के प्रारंभ पर थोड़ी जिज्ञासायें थी।बापू ने बताया कि एक प्रश्न बार-बार पूछा जाता है कथा प्रारंभ में स्तुति थोड़ी ज्यादा लंबी है!बापू ने बताया कि पहले तो यह बहुत लंबी थी,अब थोड़ा छोटा कर दिया गया है।और व्यासपीठ परिवर्तनशील है यहां निरंतर नूतनता है।यदि आपका समय बहुत कीमती है तो जहां तक स्तुति चले इतना देर से आए! और यदि जल्दी आते हैं तो फिर राम की स्तुति में राम की झांकी करिए,ध्यान करिए!हो सके तो साथ में सुर मिलाकर गाएं और लोकाभिरामम शुरू हो तो श्री राम के स्वरूप का ध्यान कीजिए। यह संभव न हो तो आप गाइए या तो इतने समय सो जाइए!फिर बापू ने बताया कि कथा में लोग सो जाते हैं या तो फोन चालू रखते हैं।स्तुति लंबी है तो जवाब यह है कि स्तुति करते हैं,निंदा नहीं करते!! और स्तुति भी हम ऐर गैर की नहीं इष्ट की करते हैं। तो नियम निभाते रहिए।बापू ने कहा कि मानस अतिथि देवो भव में जो दो पंक्तियां हैं हमारा पुण्य है,नसीब है कि दोनों भाई को हमारे नेत्रों का अतिथि कहा गया है।। हम पलक पावडे बिछा कर प्रतीक्षा में है कि कोई नयन के अतिथि आए।। और जो निगाहों के अतिथि बन जाते हैं फिर वो अपना बना देते हैं और अपना बना कर मिटा देते हैं! कहीं के नहीं रखते!! जो हम चाहते हैं वह होता नहीं है।जो होता है वो हमें भाता नहीं।जो भाता है वह मिलता नहीं और मिलता है और टिकता नहीं।। इसी सूत्र को आगे बढ़ाते हुए बापू ने कहा कि जो टिकता है वह पुराना हो जाएगा कुछ नूतन होना चाहिए।।

नेत्र के अतिथि के पांच लक्षण होने चाहिए:

एक-अतिथि ऐसा होना चाहिए जो आते ही प्रिय लगे।।

दो-अतिथि पूज्य होना चाहिए।।

तीन-अतिथि कभी ना कभी प्राप्त होना चाहिए।। बापू ने कहा कि प्रतीक्षा ही परमात्मा है। और अतिथियों का १६ प्रकार से अभिवादन करना चाहिए:

आसन, पाध्य, अर्ध्य, आचमनी, स्नान, गंध, वस्त्र अर्पण, पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य, आचमनी, तांबूल, दक्षिणा, प्रदक्षिणा और आरती।।

चौथा-अतिथि पवित्र होना चाहिए।। पूज्य को प्रिय को पवित्र को ही हम देव कहते हैं।

पांच-अतिथि परम करुणामई होना चाहिए। पहले के जमाने में अतिथि पैदल चलकर आते थे।जैसे हमने कहा कि गंगा आदि अतिथि है,तो सब पैदल है गंगा किसी वाहन में नहीं बैठती। गाय भी अपने पैर पर आती है,गोविंद,गुरु सब अपने पैरों से ही चल कर आते हैं।

और ६० साल की कथा यात्रा में कुछ पाया खोया नहीं जो था उसे पहचाना।। पाया तो सब ने हैं लेकिन पहचानते नहीं।

फिर कथाक्रम में हनुमंत वंदना के बाद नाम महिमा प्रकरण में रामनाम की वंदना हुई। नाम सभी कामनाएं जैसे दुख,दरिद्र,इर्षा,लोभ, स्पर्धा को काटता है मिटाता है। काशी में जब किसी का मृत्यु होती है तो अंत समय शिवजी कान में रामनाम महामंत्र बोलते हैं ताकि जीव को मुक्ति मिले। राम नाम भी है और महामंत्र है।।यह शास्त्र सम्मत बात है। पार्वती रोज सहस्त्रनाम का जाप करती थी यह व्रत था और शिव जी ने रामनाम सहस्त्रनाम तुल्य कह कर एक ही बार नाम का महिमा बताया।।हम ध्यान पूजा यज्ञ नहीं कर पाएंगे केवल हरि नाम ही हमारा सहारा है।।

कहो कहां लगी नाम बड़ाइ।

राम ही सकहि नाम गुन गाइ।।

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