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अपनों सी दुनिया …

नज्म

भ्रम मिथ्या में डूबी, दुनिया

रहस्यों में नित्य उलझी दुनिया

प्रेम बस मोक्ष द्वार, जहां से

पर पाखंड में जकड़ी दुनिया

विश्वास फलसफा समझा जग को

पर समझ के विपरीत निकली दुनिया

पराया बना कर रखा, हमको

पर समझाते थे अपनों सी दुनिया

क्षणभंगुर जीवन यहाँ सबका

पर सत्य को कहाँ समझती दुनिया

पता किसे डूबे किस लहर से?

कागज की कश्ती सी बहती दुनिया

सुदिन के संगी अल्पना सभी हैं

दुर्दिन में शामिल न होती दुनिया

©अल्पना सिंह, शिक्षिका, कोलकाता                           

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