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आम आदमी के जीवन पर हमेशा लिखते रहे मुंशीप्रेमचंद्र …

मुंशी प्रेमचंद जी का जन्म ३१ जुलाई १८८० में बनारस जिले के लमही गाँव में हुआ था।

प्रेमचंद सर्वाधिक लोकप्रिय कहानीकार, उपन्यासकार एवं विचारक थे। १९०६ से १९३६ के बीच लिखा गया प्रेमचंद का साहित्य इन तीस वर्षों का सामाजिक-सांस्कृतिक दस्तावेज है। इसमें उस दौर के समाज सुधार आंदोलनों, स्वाधीनता संग्राम तथा प्रगति वाद आंदोलनों के सामाजिक प्रभावों का स्पष्ट चित्रण है। उनमें दहेज, अनमेल विवाह, पराधीनता, लगान, छुआछूत , जातिभेद, विधवा विवाह, आधुनिक स्त्री-पुरुष समानता आदि उस दौर की सभी प्रमुख समस्याओं का चित्रण मिलता है।

उन्होंने सेवासदन, रंगभूमि, निर्मला, गबन, कर्मभूमि, गोदान आदि लगभग डेढ़ दर्जन उपन्यास तथा कफ़न,

पूस की रात, पंच परमेश्वर, बड़े घर की बेटी, बूढ़ी काकी, दो बैलों की कथा आदि तीन सौ से अधिक कहानियाँ लिखीं।

उनमें से अधिकांश हिंदी तथा उर्दू दोनों भाषाओं में प्रकाशित हुईं। उन्होंने अपने दौर की सभी प्रमुख उर्दू और हिन्दी पत्रिकाओं-जमाना, सरस्वती, माधुरी, मर्यादा, चाँद, सुधा आदि में लिखा। उन्होंने हिन्दी समाचार पत्र जागरण तथा साहित्यिक पत्रिका हंस का प्रकाशन और संपादन भी किया।

जीवन के अंतिम दिनों तक वे साहित्य सृजन में लगे रहे।

 

“ईदगाह” कहानी की समीक्षा

प्रेम चंद जी की कहानी “ईदगाह” मेरे जीवन को ही नहीं सामाजिक जीवन को भी स्पर्श करती है।

ईदगाह कहानी जीवन बोध लिए एक आशावादी कहानी है। प्रेमचंद को इस कहानी को लिखे कई दशक बीते पर आज भी समाज के लिए यह प्रेरणादायी है। समय बदल गया पर जीवन की वास्तविकता वहीं की वहीं रही। लेखक का दूरदर्शी दृष्टिकोण लेखक को अनमोल एवं प्रसिद्ध बना गया।

इस कहानी में ग़रीबी को अपराध बोध नही माना है। ईद का त्योहार जो ख़ुशियाँ का माहौल लेकर आया है, इंसान की ख़ुशियाँ  ग़रीबी के आगे मजबूर हो जाती हैं। इस अहसास की गहराइयों को क़लम के माध्यम से लेखक ने व्यक्त किया है। धन से मन का क्या सम्बन्ध है, जीवन की मार्मिकता को ईदगाह कहानी के माध्यम से महसूस किया जा सकती है ।

रमज़ान के पूरे तीस दिनों के बाद उत्साह भरा ईद का आना बेइंतहा ख़ुशी का पैग़ाम है।  बहुत ख़ुशी में, बहुत दुःख में, बहुत ग़रीबी में गुज़री ज़िन्दगी को हर हाल में ख़ुशहाल व तालमेल बनाकर रखना जीवन में चुनौती जैसा है। जो इस कहनी में बखूबी सीखने को मिलता है।

कहानी इस प्रकार से जीवन्त है- आज ईद का दिन है। चारों ओर गाँव में ईद के मेले में जाने की ख़ुशी छाई हुई है। मेला जाने की ख़ुशी में लोग जल्दी-जल्दी अपना काम निपटा रहे हैं।

इस कहानी का नायक हामिद जो लगभग ४/५ वर्ष का छोटा बालक है। वह भी ईदगाह जाने के लिए दूसरे बच्चों की तरह ही सपने बुन लेता है। हामिद की दादी अमीना ग़रीबी से हारी ईद के आने से दुखी उदास होकर रोने लगती है, क्यूँकि उसके पास ईद मनाने के लिए पैसे नहीं हैं। बेबस अमीना सोचती है ये निगोड़ी ईद क्यूँ आई?  अमीना अपने बेटे को याद करके जो अब इस दुनिया में नहीं है, ख़ुशी में मातम मनाती रोती है कि काश ! आज उसका बेटा होता तो कमाकर कुछ पैसे तो लाता। कैसे वो नादान हामिद को हमउम्र बच्चों जैसी ख़ुशियाँ दे।

गाँव में पुरुष, महिलाएँ बच्चे सभी बहुत खुश हैं। कई दिनों से तैयारी कर रही महिलाएँ ईद पर आज पकवान व दूध सेवियाँ बनाने में लगी हैं। ऐसा मालूम देता है जैसे बच्चों की उमंगों को पंख लगे हों। मासूम, अनाथ हामिद दादी के दुख से बेख़बर आशा लगाये बैठा है, कि उसके अम्मी-अब्बा भगवान के घर गये हैं,  जब आयेंगे तो उसके लिए ख़ूब खिलौने पैसे व सामान लेकर आयेंगे, आशावादी हामिद यही सोचकर ख़ुश रहता है। अमीना हामिद को ख़ुश देखना चाहती है।

इस कहानी में अमीना हामिद के मासूम सवाल और ईदगाह जाने की ख़ुशी देखकर भीतर ही भीतर परेशान रहती है, कि वो हामिद के लिए नये कपड़े व पैसे कहाँ से लाये?

लेखक कहता है कि, “आज ईद मुहर्रम न हो जाये”, ये बात गाँव के चौधरी क़यामत अली, जो मजबूत व ताकतवर है, उस पर व्यंग हैं । मतलब उसको ख़ुश न करना गाँव में मुसीबतों को बुलवा देना जैसा है।

समाज में सदियों से ताक़तवर लोग अपना दबदबा व बोलबाला बनाये रखते आये हैं।

मुंशी प्रेमचंद ने ईद की नमाज़ में माध्यम से विखंडित समाज को जोड़ने का प्रयास किया है।

तथा ये कहानी समाज को यह संदेश देती है कि अपने आप पर संयम कैसे रखें तथा कम में गुज़ारा कैसे करें?

अमीना बच्चे की भावनाओं को समझते हुए हामिद के लिए नया कुर्ता-पैज़ामा बनवाती है। नये कपड़े पहनाकर साथ में तीन पैसे खाने-पीने के लिए देकर ईदगाह भेज देती है। हामिद अपने दोस्तों के साथ ख़ुशी से मेला जाता है।

मेले में मासूम हामिद को लुभावने सामान आकर्षित करते हैं । पर उसके पास तीन ही पैसे हैं और उसका मन खिलौने को देखकर ललचाता भी है लेकिन उसके ज़हन में बारंबार दादी का ख़याल आता जाता है।

लेखक ने, कहानी के माध्यम से गाँव से ईदगाह जाने वाले रास्ते में आने वाले शहर के भवन, अदालत, कॉलेज, क्लब, पुलिस आदि सभी से अवगत कराने का पूरा प्रयास किया है। बचपन में मेला जाने की जिज्ञासाएँ, उत्साह-उमंग, तर्क-वितर्क, मेले में तरह-तरह के खिलौने देख संयम रखना, पैसे हैं पर खर्च कैसे करें ये सोचना, बालक संयम एक उदाहरण है। हामिद मिठाई देखकर खाने से मना कर देता है। तमाशा नही देखता, पुलिस, वकील, घोड़ा कुछ नहीं ख़रीदता, बस, वो तो अपने तीन आने को बड़े सोच-विचार कर खर्च करना चाहता है।

अन्त में हामिद मोलभाव कर अपने तीन पैसे से दादी के लिए चिमटा ख़रीद ही लेता है। (क्यूँकि हामिद को अपनी दादी का रोटी बनाते हुए हाथ जलने का दृश्य याद आते ही दुःख आ जाता है) हामिद, चिमटा ख़रीदकर अपने दोस्तों से उसकी उपयोगिता का वर्णन बडे ही आत्मविश्वास से करता है।

दोस्तों ! ये चिमटा ग़ज़ब है, कंधे पर रख लो तो बंदूक़ है, हाथ में लो तो फ़क़ीरों का चिमटा बन जाता है। कभी नही टूटने वाला ये तो  “रुस्तम-ए-हिन्द है”, ये तो “बब्बर शेर है”। दोस्त उसकी बातों से सहमत हो जाते हैं।

हामिद घर लौटकर चिमटा दादी के हाथों में देते हुए गर्व महसूस करता है। चिमटा देख दादी भावुक हो जाती है । हामिद को ख़ूब दुलार कर फूट-फूटकर रोने लगती है। नादान हामिद आँसुओं का भाव समझ नहीं पाता है। जब हामिद दादी अमीना को सम्भालता है। सम्भालते हुए लगता है हामिद बड़ा है और अमीना छोटी हो जैसे, अमीना उसको रोते-रोते दुआएँ देती है।  मासूम हामिद बड़ों की तरह अमीना के आँसू पूछता है। दृश्य अत्यधिक मार्मिक दिखलाई पड़ता है। कहानी में मार्मिक भावों की अभिव्यक्ति लेखक प्रेमचंद की लेखनी की विशेषता है।

इस कहानी का नायक हामिद जो सरल, कल्पनाशील बालक है। दादी से असीम प्यार करने वाला हामिद संवेदनशीलता का प्रमाण है। हामिद अपने को को किसी से कम नहीं समझता।  मित्रों के ( नूरे, मोहसीन, सम्मी, मोहम्मद) हास्य व्यंग का तर्कशील होकर जवाब देना जानता है।

मैं अनिता चंद- ईदगाह से सीख लेकर ईदगाह की समीक्षा लिख रही हूँ। ईदगाह मेरे बचपन की पसंदीदा कहानियों में से है। जैसे मेरे माता-पिता ने इस कहानी को जीवन में आत्मसात् करने की कोशिश की, वही प्रयास आज तक मेरे साथ चला आ रहा है। कहने का तात्पर्य यह है, कि कहानीकार जो लिखता है उससे कई जिन्दगियाँ, कई परिवार, और पीढ़ी दर पीढ़ी प्रभावित होती है।

 

 

©अनिता चंद, नई दिल्ली                 

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