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मृगमरीचिका …

 

भोग और भाग्य में है अंतर
यह बात समझ में आई
ईश्वर की लीला क्या है
यह जान ना पाया कोई

थाल ख़ुशियों के थे
रखे भरे
पर भर ना पाया वह मुट्ठी में

जड़ें हीरो के हार बंद थे
गले सजा के
कभी ना देखें उसने

भरी ख़ुशी थी दिल में उसके पर
कस्तूरी की चाह में
ख़ुद ही मृगमरीचिका
वो बन बैठे

हर दुख की औषधि थी
हृदय में
पर
झांक ना पाए अंतर्मन में

प्रसन्नता ही
वो दवा है
जो ढूँढें मिले
ना कहीं
ना किसी वैध हक़ीमों के दवाख़ाने में
और
ना ही हाट बाज़ारों में

बड़ी छोटी सी बात है
जितनी ख़ुशी बाँटोगे जग में
ख़ुद की झोली भर लोगे

लालच द्वेष क्रोध रखोगे
मन में यदि
तब
आग में उसकी ख़ुद ही
तुम जल जाओगे

दिया है जब ईश्वर ने तुझको
सुख सब भाग्य में तेरे
भोग का रस भी चखले बंदे
रह जाएगा सब जग में

भाग्यशाली बनाया जब
ईश्वर ने तुमको
भाग्यशाली बने रहने दो॥
अपने मन के द्वन्द्वों के कारण
भाग्यहीन मत कहलाना तुम

 

@सावित्री चौधरी, ग्रेटर नोएडा

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