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इन दिनों मन…

कभी कभी बहुत जरूरी हो जाता है
चुप हो जाना
शायद, बोलते जाना और
बोलते जाना अर्थहीन हो
मुंहचिढ़ाने लगता है

एक चुप, मौन में धंस जाना चाहते हैं

पहाड़ समझ आने लगते हैं
उनकी जड़ता, उनकी खामोशी
उनकी मिट्टी, सब संवाद
समझ आने लगते हैं……
अनाम गुमनाम हो जाना
खुले आकाश और हवा की तरह
खुद को महसूस करना है

दिखना, सुनना, बोलना
सब निर्रथक , गैरजरूरी हो जाते हैं
मौन दुलारने लगता है
सहलाने लगता है

समय के फेरे उसके रहस्य
समझने की जरूरत भी महसूस नहीं होती
और आप बस किसी नदी की तरह
बहना स्वीकारते
हवा, पानी, आकाश, अग्नि, धरती
में घुलने, मिलने, बिखरने
के लिए अपने एकांत को
तलाशने लगते हैं….

 

©सीमा गुप्ता, पंचकूला, हरियाणा                                                                 

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