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भगवान शिव ने देव दीपावली के दिन ही किया था त्रिपुरा सुर का वध, पढ़ें पौराणिक कथा ….

नई दिल्ली । दीपावली के 15 दिन बाद, कार्त्तिक पूर्णिमा को देव दीपावली मनाई जाती है। इस दिन वाराणसी में मां गंगा के घाटों पर लाखों दीपक शाम को जलाए जाते हैं। मान्यता है कि देव दीपावली के दिन पतित पावनी गंगा नदी में स्नान करने से समस्त पाप धुल जाते हैं और मां गंगा की सामूहिक आरती से जीवन और जनपद धन-धान्य संपन्न हो जाते हैं।

इस दिवाली को मनाने व देखने के लिए देवी-देवता भी पृथ्वी पर उतर आते हैं। पौराणिक कथाओं के अनुसार, इस दिन भगवान शिव ने त्रिपुरासुर का वध किया था। शिव पुत्र कार्त्तिकेय ने अपने पिता की सहायता से तीनों लोकों में आतंक मचाने वाले तारकासुर का अंत किया था। उसका प्रतिशोध लेने के लिए, तारकासुर के तीन पुत्रों ने घोर तपस्या कर सृष्टि के रचयिता ब्रह्मा को प्रसन्न किया और ब्रह्मा से अमर होने का वरदान मांगा।

लेकिन ब्रह्मा ने मना कर दिया और उनसे कहा कि इसके बदले कोई ऐसी शर्त रख लें, जो बहुत ज्यादा कठिन हो और उसके पूरा होने पर ही उनकी मृत्यु हो। फिर तीनों ने कहा- आप हमारे लिए तीन पुरियों का निर्माण कर दें। वे तीनों पुरियां जब अभिजित् नक्षत्र में एक पंक्ति में खड़ी हों और कोई अत्यंत शांत अवस्था में असंभव रथ व असंभव बाण से मारे, तब हमारी मृत्यु हो। ब्रह्मा ने उन्हें यह वरदान दे दिया व असुरों के शिल्पी माया द्वारा तीन पुरों का निर्माण करा दिया।

कहते हैं, सभी देवताओं ने अपना-अपना सहयोग भगवान शिव को दिया। शिव ने अपने पाशुपत अस्त्र से तीनों पुरों के अभिजित् नक्षत्र में एकसाथ आने पर उनका विध्वंस कर दिया। तभी भूलोक और सूक्ष्म देवलोक में सुख-शांति और हर्षोल्लास का वातावरण छा गया। ईश्वर द्वारा सृष्टि से आसुरी शक्तियों के विनाश और दैवी शक्तियों के विकास का यह उत्सव देव दिवाली कहलाया।

आध्यात्मिक अर्थ में, दीपावली और देव दीपावली में कोई खास अंतर नहीं है। मुख्य दिवाली से पहले छोटी दिवाली मनाई जाती है, जो भगवान व भगवती की नरकासुर पर विजय का प्रतीक है। देव दिवाली भी महेश्वर की त्रिपुरासुर पर विजय की स्मृति का पर्व है। अध्यात्म की दृष्टि से इसे अच्छाई को अपना कर बुराइयों को मिटाना कहते हैं। अंतर्मन में इसे ज्ञान का प्रकाश जगाना व अज्ञान का अंधकार दूर करना कहते हैं। यह देने की प्रवृत्ति और दैवी गुणों को धारण करने का पर्व है।

दोनों दिवाली पर दीये जलाने की इस परम्परा का भाव एक ही है। मिट्टी के दीये हमारे मिट्टी से बने शरीर का प्रतीक हैं। दीये की लौ हमारी अंतरात्मा का स्वरूप है। इसे रूहानी ज्ञान रूपी घी और परमात्म योग रूपी अग्नि से प्रज्ज्वलित करना है। तभी हमारे जीवन से अज्ञान, अपवित्रता, दुख, अशांति व आसुरी अंधकार का नाश होगा, सुख-शांति व समृद्धि का प्रकाश आएगा।

दोनों प्रकार की दिवाली में दीपदान भी समान संदेश देता है। चाहे मां गंगा हों या मृत्यु के देवता यम, दोनों को दीप दान करने का अर्थ है परमात्मा और परमार्थ सेवा में अपना जीवन समर्पण करना। अकाल मृत्यु से बचना तथा जीवन में सच्ची सुख-शांति प्राप्त करना।

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