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साहित्य साधना …

साधना शब्द अपने आप इतना व्यापक है जिसको मापने के लिए कोई मापक इकाई नहीं बना, यह केवल अनुभव आधारित तथ्य है जिससे बताया जा सकता है कि साधक और साधना के बीच कितनी घनिष्ठता है। साधक के पराक्रम पर ही उनके साधना का परिणाम निर्भर करता है।

साहित्य साधना की अगर बात करें तो यह मंदिर के पूजा से लेकर व्यक्ति के व्यक्तित्व तक का सम्पूर्ण विवरण होता है। इसमें साधक केवल करबद्ध प्रार्थना ही नहीं करते अपने कर से कलम रूपी अस्त्र का प्रयोग कर भावों को साकार रूप देने में सक्षम होते हैं।

यह साधक के भाव या विचारों पर निर्भर करता है की उनकी सोच कैसी है ,उनका सामाजिक  या राष्ट्रीय प्रेम उनके लेखनी द्वारा उनकी साधना के रूप में निकलती है। साहित्य साधना के लिए किसी गुफा कंदरा या तरु के नीचे बैठने की आवश्यकता नही है। इसके लिए केवल साहित्य के कुछ नियम और अपने अंदर के सद्विचारों को साकार रूप देने की जरूरत।

साहित्य साधना किसी भाषा क्षेत्र समुदाय का धरोहर नहीं यह एक स्वतंत्र माध्यम है जिसे जब चाहें अपनी लेखनी या अन्य माध्यम द्वारा स्वतंत्र विचार प्रकट कर सकते है।

अंत में न  साधना का कोई थाह और न साहित्य का  इसमें गोता लगाने वाले पर निर्भर करता है की उन्होंने कितना गहरा गोता लगाया और कितने मोती ढूंढ पाया।।

 

©कमलेश झा, फरीदाबाद                                                              

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