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सुनो…

सुनो,

महसूस करता हूं

कुछ हल्के धीमें पड़ते कदम

कुछ दिनभर के थके-हारे,भारी से कदम

सपनों के पंख लगाए उड़ते से कदम..

 

सुनो,

महसूस करता हूं

जिंदगी की भागदौड़ में

कब कदमों ने पहियों का सहारा ले लिया,

समय की गति से भी ज्यादा गतिशील होने की प्रतिस्पर्धा में

हमेशा कुचला रौंदा जाता हूं,

फिर भी चुप हूं..

 

सुनो,

महसूस करता हूं

अपनों के मिलने की खुशी

साथ ही बिछोह का अथाह दर्द,

जानकर भी अनजान बनती

भागती छिपतीं परछाइयां और

कुछ अनजान परछाइयों का

आपसे में मिल जाना,

उस बिछड़न और मिलन का साक्ष्य हूं..

 

सुनो,

महसूस करता हूं

कभी कीचड़ से सना

कभी सुंदर सपाट और चिकना

आरंभ से अंत की परिधि से अनभिज्ञ,

अपितु लक्ष्य तक पहुंचने का जरिया हूं..

 

सुनो,

महसूस करता हूं

सर्दियों की कड़कड़ाती ठंड में

ओढ़ लिया मैंने गर्माहट से भरी अहसास को,

गर्मी की चिलचिलाती धूप में

तपाया है हरबार खुद को

जैसे वर्षों की अंतहीन तपस्या,

तो कभी बारिश की बूंदों ने

मरहम सा लगाया है मुझको..

 

सुनो,

महसूस करता हूं

वो पतझड़ के पत्तों की चरमराहट

कभी हवाओं में उड़ती हुई धूल की धुंध

कभी सुनसान रातों में

शिकायतें करती खामोशी

कहने की चाह में मुक सा रह जाता हूं

कभी मेरी आवाज़ भी सुनो…

सुनो,

मैं भी महसूस करता हूं।

-वर्षा महानन्दा

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