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किरातार्जुंनीयम …

किरातार्जुंनीयम प्रसिध्द प्रचीन संस्कृत ग्रन्थों में से एक ग्रंथ है। इसे एक उत्कृष्ट काव्य रचना माना जाता है। इसके रचनाकार महाकवि भारवि है। इस काव्य की रचना छठी -सातवीं सदी में माना जाता है।

किरातार्जुंनीयम का अर्थ होता है किरात और अर्जुन की कथा। इसमें महाभारत में वर्णित किरात वेश्धारी शिव के साथ अर्जुन के युद्घ की लघुकथा को आधार बनाकर कवि ने राजनीति, धर्मनीति, कूटनीति, समाजनीति, युद्धनीति जनजीवन आदि का मनोरम वर्णन किया गया है। यह काव्य बिभिन्न रसों से ओतप्रोत रचना है, किन्तु वीर रस प्रधान है। इसके 18 सर्ग है जिसका वर्णन संक्षिप्त में दिया जा रहा है।

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सर्ग-1 : हस्तिनापुर भेजे गये वनेचर का द्वैतवन में आकर युधिष्ठिर से मिलना, दुर्योधन के शासन प्रबन्ध का वर्णन तथा युधिष्ठिर के लिए/द्रौपदी का उत्तेजनापूर्ण कथन।

सर्ग-2 : युधिष्ठिर-भीम का संवाद, व्यास का आगमन।

सर्ग-3 : युधिष्ठिर-व्यास संवाद, व्यास द्वारा अर्जुन को पाशुपत अस्त्र की प्राप्ति के लिए हिमालय पर जाकर तपस्या करने का आदेश, अर्जुन का प्रस्थान।

सर्ग-4 : शरद् ऋतु का वर्णन।

सर्ग-5 : हिमालय पर्वत का वर्णन।

सर्ग-6 : हिमालय पर अर्जुन की तपस्या, तपोविघ्न के लिए इन्द्र द्वारा अप्सराओं को भेजना।

सर्ग-7 : इन्द्र द्वारा प्रेषित गन्धर्वों और अप्सराओं के आने और उनके विलासों का वर्णन।

सर्ग-8 : गन्धर्वों और अप्सराओं का उद्यानविहार और जलक्रीडा।

सर्ग-9 : सायंकाल और चन्द्रोदयवर्णन, सुरतरर्णन तथा प्रभातवर्णन।

सर्ग-10 : वर्षा आदि का वर्णन, अप्सराओं का चेष्टावर्णन तथा उनका प्रयत्न वैफल्य।

सर्ग-11 : मुनिरूप में इन्द्र का आगमन, इन्द्र अर्जुन संवाद, इन्द्र का पाशुपत अस्त्र की प्राप्ति के लिए अर्जुन को शिवाराधना करने का उपदेश।

सर्ग-12 : अर्जुन की तपस्या, शूकर के रूप में मूक नामक दानव का वध के लिए आगमन, तथा किरातेशधारी शिव का भी आगमन।

सर्ग-13 : शूकररूपधारी मूकदानव पर शिव और अर्जुन के बाणों का प्रहार, उस वराह की मृत्यु, बाण के विषय में शिव के अनुचर और अर्जुन का विवाद।

सर्ग-14 : सेना सहित शिव का आगमन और सेना के साथ अर्जुन का युद्ध।

सर्ग-15 : चित्रयुद्ध वर्णन, (चित्रकाव्य)।

सर्ग-16 : शिव और अर्जुन का अस्ययुद्ध।

सर्ग-17 : शिव की सेना के साथ अर्जुन का युद्ध, शिव और अर्जुन का युद्ध।

सर्ग-18 : शिव और अर्जुन का बाहुयुद्ध, शिव का वास्तविक रूप में प्रकट होना, इन्द्रादि का आगमन, अर्जुन को पाशुपत अस्त्र की प्राप्ति, इन्द्रादि का अर्जुन को विविध अस्त्र देना, सफल सनोरथ अर्जुन का युधिष्ठिर के समीप पहुँचना।

किरातार्जुनियम के पहले सर्ग में द्रोपदी और दूसरे में भीम द्वारा युधिष्ठिर को दुर्योधन के विरुद्ध युद्ध की घोषणा के लियें उकसाने और युधिष्ठिर द्वारा उसे अनीतिपूर्ण बताकर अस्वीकार कर देने के क्रम में भारवि ने राजनीति के दो छोरो के बीच द्वंद पर बहुत सार्थक विमर्श प्रस्तुत किया है।

इसी तरह ग्यारवे सर्ग में मोक्ष के स्थान पर शक्ति और प्रभुता के लिये किये जा रहे अर्जुन के तप को इन्द्र द्वारा गृहीत(प्राप्त करना) बताये जाने पर, अर्जुंन के पृतुय्त्तर के रूप में भारती ने जीवन व्यवहार मे अन्याय के प्रतिकार, लौकिक असफलता और आत्म सम्मान के महत्त्व पर जो गम्भीर विचार दिये है वे स्वस्थ लौकिक जीवन का एक संतुलित आदर्श का चित्र उपस्थित करते हैं।

किरातार्जुनियम को भारवि के द्वारा बहुत ही उत्कृष्ट तरीके से लिखा गया। इसमें काव्य चातुर्य और भाषा दोनों को बखूबी देखा जा सक्त है।

भारवि ने केवल एक अक्षर ‘ न’ वाला श्लोक लिखकर अपनी काव्य चातुरी का परिचय दिया।

कही कही कविताओं के कारण विद्वानों ने कविता को “नारिकेल फल के समान ” बताया है।

किरात में राजनीतिक सिध्दांतों का प्रतिफल भी अत्यंत उत्कृष्टता के साथ किया गया।

इसकी भाषा उदात्त एवं हृदय भावों को प्रकट करने वाली है। कवि में कोमल तथा उग्र दोनों प्रकार के भावों को प्रकट करने की समान शक्ति और सामर्थ्य थी। इस काव्य में 1030 शलोक का प्रोयोग किया गया है। इसमें 18 सर्ग है। भार वि के काव्य में चित्रालँड़कार की प्रमुखता पायी जाती है।

इसमें प्रोयोग की गई सुक्तियो के बारे में अगर बात करे तो हैरानी होगी वो आज के आधुनिक युग में बहुत सहायक है

इसमें प्रकृति के दृश्यों का वर्णन अत्यंत मनोहारी है।

किरतरुजिनियुमं में राजनीति–

 

किरतर्जुनियम में चचेरे भाईयों के बीच युध्द को दर्शाया गया है। जो धूर्त क्रीड़ा, लोभ, माया-मोह और प्रतिशोध की भावना से भरी पड़ी है।

समाजिक पक्ष — अगर हम इसके समाजिक पक्ष की बात करे तो ये बहुत ही लोकप्रिय काव्य है। इस काव्य मे समाज का आइना देखने को मिलता है।

व्यबहारिक पक्ष– अगर हम इस काव्य के व्यबहारिक पक्ष की बात करे तो ये काव्य लोगों को अपनी ओर खीचता है। इसके संवाद, दृश्य और बार्तालाप अपनी ओर आकर्षित करता है।

लेखक की दृष्टी से अगर देखा जाए तो इस अदभुत काव्य को एक बार जरूर पड़ना चाहिये।

 

©झरना माथुर, देहरादून, उत्तराखंड                             

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