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सांझ सवेरे …

चढ़ते सूरज, और ढलते दिन , छेड़

जाते यादों के तरन्नुम,

उम्र का हर दौर हसींन,प्यारे लगते बीते

पल छिन्न।

जो पास है ,नहीं वो पर्याप्त है,दिल थोड़ा

और चाहता ,

नहीं भाता सांझ और सवेरा ,मन का आंगन लागे सूना।

मृगतृष्णा में भागता जाता है मनुज, ना समझे

कहीं छूटते जा रहे अपने रिश्ते और अनुज।

सांझ लाती संदेश, बढ़ता चल समय नहीं रहता सदा एक,

सवेरा लाता उजियारा, समेट लेता सारा अंधियारा।

जीवन चक्र भी चलता यूं ही, हर रात की सुबह होती नई।

 

 

©हरप्रीत कौर, कानपुर, उत्तरप्रदेश

परिचय : विज्ञान में स्नातक, किताबें पढ़ना व संगीत सुनने व हिंदी लेखन में विशेष रुचि, फेसबुक और यू-टुयूब पर विभिन्न साहित्यिक समूहों में सक्रिय हैं। दो एनथोलॉजी और कुछ साप्ताहिक समाचार पत्रों में रचनाएं प्रकाशित, Asian literary Society से Women rising star category mai “Certificate of excellence” का सम्मान.

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