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कैसे एक क्लर्क बीएस येदियुरप्पा बना दक्षिण भारत में बना मेगास्टार सीएम, ऐसा दिलचस्प है सफर …

नई दिल्ली। बूकानाकेरे सिद्धलिंगप्पा येदियुरप्पा, शॉर्ट फॉर्म में बीएस येदियुरप्पा। कुछ दिनों से हां-ना की कश्मकश से जूझते येदियुरप्पा ने आखिर सोमवार को कर्नाटक के मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया। ठीक उसी 26 जुलाई को, जिस तारीख को उन्होंने साल 2019 में चौथी बार कर्नाटक के मुख्यमंत्री पद की शपथ ली थी।  येदियुरप्पा के राजनीतिक जीवन के उतार-चढ़ाव की कहानी बेहद दिलचस्प है। सुदूर दक्षिण में पहली बार कमल खिलाने वाले इस शख्स की जिंदगी में उसी तरह से ट्विस्ट और टर्न हैं जैसे साउथ की फिल्मों में होते हैं। येदियुरप्पा के इस सफर को देखें तो वाकई वह कई अग्निपरीक्षाओं से गुजरे हैं।

27 फरवरी 1943 को कर्नाटक के मांड्या जिले के बूकनाकेरे गांव में जन्मे येदियुरप्पा लिंगायत समुदाय से ताल्लुक रखते हैं। उनके पिता का नाम सिद्धलिंगप्पा और माता का नाम पुट्टतायम्मा था। कर्नाटक के तुमकुर में येदियुर नाम की जगह पर संत सिद्धलिंगेश्वर द्वारा बनाए गए शैव मंदिर के नाम पर उनका नाम पड़ा है। सिर्फ चार साल की उम्र में अपनी मां को खोने वाले येदियुरप्पा 1965 में समाज कल्याण विभाग में क्लर्क चुने गए थे। बाद में वो शिकारीपुर चले गए जहां वीरभद्र शास्त्री नाम के शख्स की राइस मिल में नौकरी करने लगे। बाद में इस कारखाने के मालिक वीरभद्र की बेटी मैत्रादेवी से उन्होंने 5 मार्च 1967 को शादी कर ली।

इसके कुछ अरसे बाद येदियुरप्पा ने शिमोगा में हार्डवेयर की दुकान भी खोली थी। अगर संतान पक्ष की बात करें तो येदियुरप्पा के दो बेटे और तीन बेटियां हैं। येदियुरप्पा ने इमरजेंसी के दौरान जेल की सजा भी काटी है। साल 1970 की शुरुआत  में अपने गृहजनपद शिवमोगा के शिकारीपुरा कस्बे में उन्होंने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के साथ शुरुआत की। इसके साथ ही उन्हें भाजपा की पूर्ववर्ती पार्टी जनसंघ का तालुका प्रमुख बना दिया गया। इसी शिकारीपुरा से उन्होंने साल 1983 में पहली बार विधानसभा का चुनाव जीता और अगले आठ साल तक लगातार जीतते रहे। इसके बाद पार्टी की राज्य इकाई के मुखिया से लेकर विधानसभा में विपक्ष के नेता, विधानपरिषद सदस्य और सांसद भी बने।

येदियुरप्पा साल 2004 में ही कर्नाटक के मुख्यमंत्री बन गए होते। उस साल विधानसभा चुनाव में भाजपा इस राज्य की सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी थी। लेकिन सरकार बनी कांग्रेस और जनता दल-एस के गठबंधन की मुख्यमंत्री का ताज मिला धरम सिंह को। अपनी राजनीतिक चतुराई के लिए जाने जाने वाले येदियुरप्पा ने बाद में देवगौड़ा के बेटे कुमारस्वामी से हाथ मिला लिया। साल 2006 में धरम सिंह पर खदान घोटाले का आरोप लगा और उनकी सरकार गिर गई। इसके बाद कुमारस्वामी और येदियुरप्पा ने मिलकर सरकार बनाई। इसमें तय किया गया था कि दोनों बारी-बारी से मुख्यमंत्री बनेंगे। शर्त के मुताबिक पहली बार कुमारस्वामी मुख्यमंत्री बने और येदियुरप्पा ने उपमुख्यमंत्री की कुर्सी संभाली। नवंबर 2007 में येदियुरप्पा की बारी आई, लेकिन अभी उन्हें सत्ता संभाले सात दिन भी नहीं बीता था कि कुमारस्वामी ने समर्थन वापस ले लिया।

इसके बाद आया साल 2008। वो ऐतिहासिक साल, जब येदियुरप्पा ने अकेले दम भाजपा को दक्षिण भारत का किला फतह कराया। लेकिन इसी साल उनका भाजपा से मोहभंग भी हुआ। साल 2008 में भाजपा की जीत के बाद येदियुरपा के नेतृत्व में कर्नाटक में भाजपा सरकार बनी, लेकिन इस बार भी सितारों ने येदियुरप्पा का साथ नहीं दिया। उनके ऊपर बेंगलुरु के जमीन घोटाले में अपने बेटों का साथ देने का आरोप लगा। इसके बाद उनके ऊपर अवैध खनन घोटाले को लेकर भी जांच बैठी। 31 जुलाई, 2011 को उन्हें एक बार फिर मुख्यमंत्री की गद्दी छोड़नी पड़ी। उसी साल 15 अक्टूबर को उन्होंने लोकायुक्त के सामने आत्मसमर्पण कर दिया और उन्हें एक हफ्ते के लिए जेल जाना पड़ा। छूटने के बाद येदियुरप्पा ने भाजपा का साथ छोड़ दिया और केसीपी नाम से अपनी नई पार्टी बनाई।

भाजपा का साथ छोड़ने के बाद येदियुरप्पा ने अपनी नई पार्टी बना तो ली तो लेकिन इसका अनुभव कुछ खास नहीं रहा। हालांकि साल 2013 के चुनाव में उनकी पार्टी ने भाजपा के लिए सत्ता की राह जरूर मुश्किल कर दी। केसीपी के खाते में गई छह सीटें और 10 फीसदी की वोट शेयरिंग, भाजपा का काफी नुकसान कर चुकी थी। हालांकि येदियुरप्पा का राजनीतिक भविष्य बेहद अनिश्चित नजर आ रहा था। इस बीच भाजपा भी येदियुरप्पा के जाने का खामियाजा उठा चुकी थी और उसे एक मजबूत चेहरे की तलाश थी जो 2014 के चुनाव में यहां भाजपा की नैया पार लगा सके। हालात को देखते हुए 9 जनवरी 2014 को केसीपी का भाजपा में विलय कर दिया गया। येदियुरप्पा के आने का लाभ भाजपा को मिला और लोकसभा चुनाव में भाजपा ने कर्नाटक की 28 में से 19 सीटों पर कब्जा जमा लिया। यह उस पार्टी के लिए बड़ी बात थी जो एक साल पहले ही हुए विधानसभा चुनाव में महज 19.9 फीसदी वोट हासिल कर सकी थी।

26 अक्टूबर 2016 को येदियुरप्पा को बड़ी राहत उस वक्त मिली जब 40 करोड़ रुपए के अवैध खनन घोटाले में दामाद और बेटों समेत सीबीआई ने बरी कर दिया। वहीं इसी साल जनवरी में कर्नाटक हाई कोर्ट ने उनके खिलाफ लोकायुक्त पुलिस द्वारा दर्ज भ्रष्टाचार के सभी 15 मामलों को निरस्त कर दिया। इसी साल अप्रैल में उन्हें चौथी बार कर्नाटक भाजपा का प्रदेश अध्यक्ष बना दिया गया। 2018 के विधानसभा चुनाव में वो एक बार फिर से राज्य में भाजपा की तरफ से मुख्यमंत्री पद के दावेदार थे। हालांकि चुनाव में किसी दल को बहुमत नहीं मिला और राज्यपाल ने येदियुरप्पा को सरकार बनाने का आमंत्रण देते हुए 15 दिन का समय दिया। हालांकि बाद में सियासी घटनाक्रम तेजी से बदले और सिर्फ तीन दिन बाद उन्हें पद से इस्तीफा देना पड़ा और इसके बाद जनता दल-एस और कांग्रेस की गठबंधन वाली सरकार के कुमारस्वामी को सरकार गठन के लिए बुला लिया गया।

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