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हिंदी मेरी पहचान …

हिंदी है मेरी शान

हिंदी है मेरी जान

हिंदी है रोजी रोटी मेरी

हिंदी से है पहचान मेरी।

सरल, सरस सुनने में लगती

जैसा बोले वैसा ही हैं लिखते

मन के भावों को व्यक्त करती

दुनिया भर में यह बोली जाती।

सभ्यता और संस्कृति की छाप है इसमें

तुलसी और सूर की रचनाओं में जीवन सार हो जैसे।

प्रसाद से लेकर निराला तक,

हरिवंश राय से लेकर चित्रा मृदगल तक

सबने हिंदी का मान किया

लेखनी से अपने इसका सम्मान किया।

पौराणिक कथाओं से लेकर

इतिहास की महागाथा तक

प्रेम से लेकर विरह होने तक

सबकी कहानियों को समेटा इसने।

मीठी बोली, मीठी भाषा

मीठी लगती इसकी परिभाषा

गैरों में भी अपने मिल जाते

हिंदी में जब हम वार्तालाप हैं करते।

पूर्व से लेकर पश्चिम तक

उत्तर से लेकर दक्षिण तक

सबको यह समझ में है आती

रसगुल्ले में जैसे चाशनी हो मिल जाती।

ऐसी सागर है हिंदी

ज्ञान का भंडार है जिसमें

प्यार करो इससे

स्नेह करो इससे

पहचान न धुंधला होने पाए

हिंदी का ही हम तिलक लगाएं।

 

©डॉ. जानकी झा, कटक, ओडिशा                                  

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