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गहलोत की मुश्किलें नहीं हुईं खत्म, 19 विधायकों की मीटिंग आज, शुरू हो सकता है नया एपिसोड …

जयपुर। राजस्थान में कांग्रेस आमतौर पर पूर्ण बहुमत के साथ ही आती रही है, लेकिन इस बार उसे 2018 में चुनाव जीतने के बाद से ही सरकार में चलाने में खासी मशक्कत करनी पड़ी है। 200 सीटों वाली विधानसभा में उसके 99 विधायक ही पहुंचे थे। इसके बाद उसने उपचुनाव जीतकर और बीएसपी के 6 विधायकों को शामिल कर आंकड़ा 107 तक पहुंचा लिया था। सरकार स्थिर हुई ही थी कि बीते साल सचिन पायलट खेमे ने बगावत का बिगुल फूंक दिया। 18 विधायकों के साथ सचिन पायलट दिल्ली आ गए थे और कांग्रेस पर सत्ता में फेरबदल का दबाव बना रहे थे। यहां तक कि सचिन पायलट खेमे का दावा था कि उनके समर्थन में 25 से 30 विधायक हैं।

राजस्थान में कांग्रेस में छिड़ी रार का बुधवार शाम को नया एपिसोड देखने को मिल सकता है। अब तक कांग्रेस में अशोक गहलोत खेमे का समर्थन कर रहे 13 निर्दलीय विधायकों ने नए सिरे से रणनीति तैयार करने के लिए मीटिंग बुलाई है। इन विधायकों का कहना है कि 2020 में सचिन पायलट खेमे की बगावत के चलते जब सरकार गिरने वाली थी तो उन्होंने ही सहारा दिया था। ऐसे में अब उन्हें इसका इनाम मिलना ही चाहिए। मंगलवार शाम को ही निर्दलीय विधायक रामकेश मीणा ने सचिन पायलट खेमे पर हमला बोलते हुए कहा कि उनकी बगावत की योजना बीजेपी के कहने पर तैयार हुई थी। दरअसल सचिन खेमे पर निर्दलीय और बीएसपी से कांग्रेस में आए 6 विधायक यह कहकर ही हमला बोलते रहे हैं कि उन्होंने  ही मुश्किल वक्त में सरकर बचाई है, जबकि वे लोग तो गद्दारी करने वाले थे।

यदि 18 विधायक भी कांग्रेस छोड़ देते तो गहलोत सरकार पर संकट आ जाता।  इसी बीच 13 निर्दलीय विधायकों ने गहलोत सरकार के समर्थन का ऐलान कर दिया और इस तरह से सरकाार बच पाई। अब इन विधायकों का कहना है कि उन्हें सरकार को बचाने का इनाम मिलना चाहिए। वहीं पायलट खेमे का कहना है कि बीते साल जो वादे किए गए थे, उन्हें पूरा किया जाए। इस बीच बीएसपी से कांग्रेस में आए 6 विधायकों ने भी निर्दलीय विधायकों की मीटिंग में शामिल होने का फैसला लिया है। इस तरह से विधानसभा के कुल विधायकों में से 10 फीसदी ने गहलोत पर दबाव बनाना शुरू कर दिया है। बीएसपी से आए विधायक संदीप यादव और जोगिंदर सिंह अवाना तो खुले तौर पर संकेत दे चुके हैं कि उन्हें सरकार में हिस्सेदारी मिलनी चाहिए।

सचिन पायलट बीते दिनों दिल्ली आए थे, लेकिन किसी भी सीनियर लीडर से मुलाकात नहीं की थी। कहा जा रहा है कि अशोक गहलोत और पायलट के बीच मतभेदों को सुलझाने का जिम्मा अब मध्य प्रदेश के पूर्व सीएम कमलनाथ को दिया गया है। कांग्रेस सूत्रों का कहना है कि प्रदेश में भले ही अशोक गहलोत के पक्ष में ज्यादा विधायक हैं, लेकिन सचिन पायलट बड़ा नुकसान पहुंचाने की स्थिति में जरूर हैं। कांग्रेस में अकसर दरार देखने को मिली है। राज्य के प्रदेश अध्यक्ष गोविंद सिंह दोस्तारा और संसदीय कार्य मंत्री शांति धारीवाल बीते दिनों अशोक गहलोत के सामने ही भिड़ गए थे।

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