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भृगु ऋषि से लेकर संत कबीर दास का तपोस्थलि रहा अमरकंटक का पंचकोसी क्षेत्र …

अमरकंटक को फ्री जोन बनाने में राजनैतिक दूरदर्शिता का अभाव

नर्मदा परिक्रमा भाग -39

अक्षय नामदेव। मत्स्य पुराण के 188 अध्याय के श्लोक नंबर 93 के अनुसार जो मनुष्य अमरकंटक पर्वत की प्रदक्षिणा पूर्ण करता है वह पौंडरीक यज्ञ का फल प्राप्त करता है।

मां नर्मदा की संपूर्ण परिक्रमा जो लगभग 32 00किलोमीटर की है परंतु मां नर्मदा की संपूर्ण परिक्रमा के अलावा एक और परिक्रमा होती है जो मां नर्मदा पंचकोसी परिक्रमा कहलाती है। यह पंचकोसी परिक्रमा अमरकंटक पर्वत पर की जाती है जो लगभग 5 कोस की होती है। दरअसल मां नर्मदा के उद्गम स्थली अमरकंटक पर्वत पर बहुत से ऐसे तीर्थ क्षेत्र हैं जहां दर्शन करना अत्यंत पुण्य फलदाई है तथा यह तीर्थ क्षेत्र मां नर्मदा पंचकोसी परिक्रमा क्षेत्र अमरकंटक में स्थित है। जो भी परिक्रमा वासी, श्रद्धालु अमरकंटक पहुंचते हैं वे इन तीर्थों का आवश्यक रूप से दर्शन करना चाहते हैं परंतु इन्हें देखने घूमने के लिए समय निकालने की आवश्यकता होती है।

जो लोग मां नर्मदा की पूरी परिक्रमा नहीं कर पाते उन्हें अमरकंटक आकर मां नर्मदा पंचकोशी परिक्रमा क्षेत्र की परिक्रमा करना चाहिए। यह पंचकोशी परिक्रमा माई की बगिया या नर्मदा कुंड से प्रारंभ करके सोनमुड़ा कबीर चबूतरा, चंडी गुफा, कपिलधारा, जलेश्वर, दुर्गा धारा, माइ का मंड़वा होकर माई की बगिया नर्मदा कुंड पहुंचकर समाप्त हो जाती है। यात्रा थोड़ी कठिन एवं दुर्गम जरूर है परंतु माता के सच्चे भक्त इस पंचकोशी परिक्रमा को भक्ति भाव से हंसते-हंसते कर लेते हैं।

एक झोले में आवश्यक सामग्री, जल का पात्र एवं छड़ी आवश्यक रूप से रखना चाहिए ।मां नर्मदा पंचकोशी परिक्रमा की समय अवधि लगभग 5 दिन है तथा इस परिक्रमा को करने की विशेष रूप से तीन तिथियां है। पहली तिथि कार्तिक मास में एकादशी शुक्ल पक्ष से कार्तिक पूर्णिमा तक की है तथा दूसरी तिथि माघ महीने में शुक्ल पक्ष नवमी से शुक्ल पक्ष चतुर्दशी तक होती है वहीं तीसरी तिथि वैशाख महीने में शुक्ल पक्ष द्वितीय से शुक्ल पक्ष सप्तमी तक होती है।

पंचकोशी परिक्रमा का आरंभ मां नर्मदा उद्गम में नर्मदा की पूजा अर्चना, कड़ाही प्रसाद, दान इत्यादि करने के पश्चात शुरू होती है। पंचकोसी परिक्रमा के समय मां नर्मदा के उद्गम कुंड से नर्मदा जल पूजन हेतु रखना चाहिए तथा यह परिक्रमा पैदल ही करनी चाहिए। 5 दिन की पंचकोसी परिक्रमा में नर्मदा कुंड से मां नर्मदा की क्रीड़ा स्थली माई की बगिया,इसके बाद परिक्रमा वासी को सोनमुड़ा जाना चाहिए जहां सोन कुंड के समीप ही भद्र उद्गम कुंड है सोन तथा भद्र दोनों का संगम कुंड समीप ही है।

सोनमुडा से कच्चे मार्ग के माध्यम से लगभग 2 किलोमीटर चलने पर सिद्धिविनायक नामक गणेश की सातवीं आठवीं शताब्दी की प्रतिमा उत्कीर्ण है। सिद्धिविनायक के समीप ही गणेश की एक और प्रतिमा शोभायमान हैं जिन्हें फरस विनायक कहा जाता है। इस प्रतिमा में गणेश के एक हाथ में फरस विद्यमान हैं। भगवान फरस विनायक के दर्शन के बाद ऋषि भृगु की तपोभूमि भृगू कमंडल के दर्शन को परिक्रमा वासी जाते हैं। मान्यता है कि ऋषि भृगु तपस्या हेतु इसी स्थान पर आए थे और उनका कमंडल यहां टूट गया था जिसके कारण यह स्थान भृगू कमंडल कहलाता है। यहां एक बड़ा सा चट्टान है चट्टान में क्षेत्र है जिसमें सदैव जल भरा रहता है जो कि भृगू कमंडल कहलाता है।

पंचकोसी परिक्रमा वासियों के द्वितीय विश्राम का पड़ाव धूनी पानी है इस स्थान पर परिक्रमा वासी रात्रि विश्राम के पश्चात प्रातः काल मां नर्मदा की पूजा अर्चना कड़ाही प्रसाद चढ़ा कर आगे की परिक्रमा करते हैं।

पंचकोसी परिक्रमा का प्रमुख उद्देश्य अधिक से अधिक समय मां नर्मदा की आराधना में लगाना है इसलिए रात्रि विश्राम से पूर्व भजन संकीर्तन इत्यादि अवश्य करना चाहिए। पंचकोसी परिक्रमा वासियों को सत्य का ज्ञान होता है वह सांसारिक मोक्ष माया के बंधन से मुक्त होकर ईश्वरी शक्ति की आराधना में अपना सारा समय लगाता है। धूनी पानी से आगे चलने पर चंडी गुफा नामक स्थान आता है इस पवित्र गुफा के दर्शन के बाद रूद्र गंगा के दर्शन होते हैं।

परिक्रमा के दौरान परिक्रमा वासियों को भिक्षावृत्ति कर भिक्षार्जन करनी चाहिए। यह परिस्थिति के अनुसार तथा स्वेच्छा से हो पाता है।ऐसी मान्यता है कि मां नर्मदा मैकल पर्वत पर विभिन्न दिशाओं में अनेक नाम से प्रवाहित होती है। रूद्र गंगा के दर्शन करके पंचकोसी परिक्रमा वासियों को हमारे देश के महान निर्गुण संत कबीर दास की तपोस्थली कबीर चबूतरा जाना चाहिए।(पंचकोसी परिक्रमा क्षेत्र के तीर्थों का विस्तार से आगे अलग से वर्णन करेंगे )

पंचकोसी परिक्रमा क्षेत्र अमरकंटक के ज्यादातर तीर्थ जैसे माई की बगिया, जालेश्वर धाम, दुर्गा धारा धर्म पानी, माई का मड़वा इत्यादि अमरकंटक से सटे छत्तीसगढ़ राज्य की सीमा में है जो अमरकंटक पहाड़ में ही स्थित है यही कारण रहा कि हमने वर्ष 2000 में मध्यप्रदेश से छत्तीसगढ़ के अलग होने के कारण हमनें “तीर्थ स्थली अमरकंटक को फ्री जोन बनाओ” वैचारिक जनआंदोलन शुरू किया था।

इस अमरकंटक फ्री जोन बनाओ आंदोलन को ब्रह्मलीन महंत नरेश पुरी महाराज जालेश्वरधाम अमरकंटक, ब्रह्मलीनबाबा मनु गिरी महाराज आदिशक्ति मां दुर्गा देवी मंदिर धनपुर के आशीर्वाद से साथी हमारे मार्गदर्शक राम निवास तिवारी, ओंकार प्रसाद सोनी भल्लू भैया गिरवर वाले , सुरेश ध्रुव नेवसा वाले, राजेश अग्रवाल रज्जे भैया गौरेला के सहयोग से प्रारंभ किया गया था जिसका भरपूर समर्थन पेंड्रा गौरेला एवं बिलासपुर के पत्रकारों ने अपनी लेखनी के माध्यम से किया था। हम नहीं चाहते थे की करोड़ों हिंदुओं की आस्था स्थली अमरकंटक को क्षेत्र जिला या राज्य की सीमाओं में बांटकर देखा जाए।

हमारे अमरकंटक फ्री जोन बनाओ आंदोलन को विभिन्न राजनीतिक कारणों से आंशिक सफलता ही प्राप्त हुई हालांकि अमरकंटक को फ्री जोन बनाने के लिए हमने मध्य प्रदेश की तत्कालीन मुख्यमंत्री साध्वी उमा भारती से लेकर तत्कालीन मानव संसाधन विकास मंत्री डॉ मुरली मनोहर जोशी तक से दिल्ली जाकर मुलाकात की थी। इस अमरकंटक फ्री बनाओ आंदोलन को विश्व हिंदू परिषद के तत्कालीन अंतरराष्ट्रीय अध्यक्ष अशोक सिंघल ने भी समर्थन दिया था तथा इसके लिए तत्कालीन सरकारों से बात करने के लिए भाजपा के तत्कालीन प्रांतीय संगठन मंत्री रामप्रताप सिंह एवं विश्व हिंदू परिषद के चंपत राय को दिशा निर्देशित किया गया था। पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी बाजपेई के संरक्षण में काम कर रही धर्म यात्रा महासंघ ने भी इस अमरकंटक फ्री जोन बनाओ आंदोलन को समर्थन दिया था परंतु दुर्भाग्य उस समय मध्यप्रदेश एवं छत्तीसगढ़ की तत्कालीन भाजपा सरकारों को इस विषय पर ध्यान देने के लिए समय ही नहीं था जिसकी परिणीति है कि आज अमरकंटक छत्तीसगढ़ के गौरेला पेंड्रा मरवाही जिला से बिल्कुल सटे होने के बावजूद भी दूर है।

कभी वह समय था जब छत्तीसगढ़ के गांव-गांव से ग्रामीणों के तथा स्कूलों कालेजों से छात्र छात्राओं के धार्मिक एवं शैक्षणिक भ्रमण अमरकंटक के लिए हुआ करते थे परंतु राज्य विभाजन के बाद अंतरराज्यीय सीमा विवाद, परमिट का चक्कर एवं भारी भरकम टैक्स के कारण बिल्कुल बंद हो गए । सब जानते हैं कि अमरकंटक पहुंचने का सबसे समीपी रेलवे स्टेशन पेंड्रारोड है मध्यप्रदेश एवं छत्तीसगढ़ सहित देश के कोने कोने से तीर्थयात्री एवं परिक्रमा वासी तीर्थ स्थली अमरकंटक आने के लिए पेंड्रा रोड रेलवे स्टेशन में उतरते हैं क्योंकि पेंड्रारोड रेलवे स्टेशन तीर्थ स्थली अमरकंटक जाने के लिए सबसे निकटतम एवं सुविधाजनक स्टेशन है परंतु अंतरराज्यीय सीमा एवं परमिट तथा टैक्स की अधिकता के कारण पेंड्रारोड से अमरकंटक आने जाने के लिए बसों की संख्या बिल्कुल नगण्य है ।

रेलवे स्टेशन पेंड्रारोड में भी तीर्थ स्थली अमरकंटक आने वाले श्रद्धालुओं परिक्रमा वासियों के लिए कोई इंतजाम नहीं है जबकि यह पेंड्रारोड रेलवे स्टेशन अन्य साधारण रेलवे स्टेशन की तरह नहीं है। हर साल देवउठनी एकादशी के बाद हजारों परिक्रमा वासी एवं तीर्थयात्री अमरकंटक आना शुरू हो जाते हैं तथा पेंड्रारोड रेलवे स्टेशन ही उतरते हैं परंतु सरकारों को इस दिशा में सोचने की कहां फुर्सत है। एक उल्लेखनीय कार्य स्वर्गीय नेता अजीत जोगी ने छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री रहते हुए अवश्य कर गए जो उन्होंने पेंड्रारोड गौरेला से चुकतीपानी होकर सीधे जालेश्वर धाम तक पक्की सड़क का निर्माण करा दिया जिससे पेंड्रारोड गौरेला से जालेश्वर महादेव हो कर तीर्थ स्थली अमरकंटक जाने का सीधा एवं सरलतम मार्ग प्रशस्त हुआ और रेलवे स्टेशन पेंड्रा रोड से अमरकंटक जाने के लिए पर्याप्त मात्रा में टैक्सी ऑटो उपलब्ध रहते हैं।

हर हर नर्मदे                                                                                                                          क्रमश:

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