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डॉक्टर भी फर्जीवाड़ा करने से नहीं करते गुरेज, आयुष्मान से सीएम योगी राज में 139 अस्पतालों ने की सरकारी धन की लूट …

लखनऊ। उत्तर प्रदेश अपराधों के मामले में भारत का मुख्य गढ़ माना जाता है। यहां जो कुछ होता है उसे देखकर भारत के दूसरे राज्यों के अपराधी करते हैं ऐसा कहा जाता है। इसी क्रम में केंद्र की आयुष्मान योजना को यूपी के कुछ अस्पताल के डॉक्टरों ने धंधे का साधन बना लिया है। कहीं बिना ऑपरेशन किए ही पैसे वसूल लिए गए तो कहीं बिना जरूरत के ही मरीज को भर्ती कर लिया। किसी ने तीन दिन में छुट्टी के बाद भी 10 दिन मरीज को एडमिट दर्शाकर भुगतान ले लिया। फर्जीवाड़ा करने वाले 139 अस्पतालों को आयुष्मान योजना से बाहर किया गया है। इनमें से बहुतों पर जुर्माना भी लगाया गया है।

केंद्र सरकार ने गरीब तबके के लोगों को महंगे इलाज की चिंता से मुक्ति दिलाने को आयुष्मान भारत योजना शुरू की थी। इसके तहत पांच लाख रुपये तक के इलाज का खर्च सरकार उठाती है। इसी तर्ज पर प्रदेश में मुख्यमंत्री जन आरोग्य योजना भी चल रही है। मगर कुछ अस्पतालों ने इन योजनाओं को कमाई का जरिया बना लिया है। मगर योजना की कड़ी निगरानी के चलते यह तमाम फर्जीवाड़ा सामने आ रहा है। बीते ढाई साल में फर्जीवाड़ा करने वाले 139 अस्पतालों पर गाज गिरी है।

बरेली के एक अस्पताल पर इसलिए कार्रवाई की गई क्योंकि वहां मरीज का ऑपरेशन ऐसे डॉक्टर से करा दिया गया, जो उसे करने योग्य ही नहीं था। वहां दो डॉक्टरों ने अस्पताल पर उनकी डिग्री फर्जी ढंग से प्रयोग करने का आरोप भी लगाया। शिकायत के बाद कुछ अस्पताल खुद भी योजना से अलग हो गए।

कई अस्पतालों को कोविड-19 के मरीजों का इलाज न करना भी महंगा पड़ा। आयुष्मान योजना के संचालन का काम देख रही सांचीज ने शामली स्थित हॉस्पीटल सहित कई अन्य ऐसे अस्पतालों को सूची से बाहर कर दिया है, जिन्होंने कोरोना पीड़ितों का इलाज करने से इंकार कर दिया। इसके अलावा कई अस्पतालों द्वारा इलाज के लिए मरीज से पैसे मांगे जाने की शिकायतें भी सही पाई गईं। जिसके चलते उनके खिलाफ कार्रवाई की गई है।

सांचीज की सीईओ संगीता सिंह की मानें तो कई अस्पतालों ने विभिन्न तरीकों से फ्रॉड करके योजना से भुगतान ले लिया। मगर जब ऐसे मामलों की जांच की गई तो फर्जीवाड़ा पकड़ में आ गया। अभी तक ऐसे अस्पतालों से 20 करोड़ रुपये से अधिक की रिकवरी की जा चुकी है।

आयुष्मान योजना के तहत आने वाले संदिग्ध मामलों की तीन स्तर पर जांच की व्यवस्था है। सबसे पहले जिलों में तैनात एजेंसी द्वारा संदिग्ध मामलों के बारे में सांचीज को जानकारी दी जाती है। फिर प्रदेश में एंटी फ्रॉड के मामलों को देखने के लिए अलग टीम है। ज्यादा बड़े और संवेदनशील मामलों में नेशनल एंटी फ्रॉड यूनिट की मदद ली जाती है।

कुछ संदिग्ध अस्पतालों में योजना के तहत आने वाले क्लेम पर पैनी नजर रखने के साथ ही ऐसे केसों की भी छानबीन की जाती है, जिसमें गंभीर बीमारी न होने के बाद भी 10 दिन या उससे अधिक समय मरीज को भर्ती दिखाया गया। वहीं ऐसे केस भी राडार पर हैं, जिसमें एक ही परिवार के सदस्यों को बार-बार इलाज के नाम पर भर्ती दिखाया जाता है।

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