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दिल्ली दरबार: सरकार है जो सुनती नहीं किसान हैं जो मानते नहीं …

नई दिल्ली (पंकज यादव) । किसान आंदोलन के आज सात माह पूरे हो गए और किसान अपनी मांग को लेकर लगातार धरना—प्रदर्शन भी कर रहे हैं। लेकिन सरकार भी किसानों की बात न सुनने को तैयार है और किसान भी पीछे हटने के लिए तैयार नहीं है। ऐसा नहीं ​है कि सरकार और किसानों के बीच वार्ता का दौर नहीं चला। कई बार बैठकें हुई लेकिन कोई हल नहीं निकला।

अब सवाल सीधा है कि या तो सरकार नहीं सुन रही है या फिर किसान नहीं मान रहे हैं। दोनों बातें हैं सरकार का अपना तर्क है और किसानों का अपना। कोई भी झुकने को तैयार नहीं है। ऐसी स्थिति में समाधान निकलता नजर नहीं आ रहा है। 26 जून को किसानों का एक बार फिर ट्रैक्टर मार्च निकालना निश्चित तौर पर दिल्लीवासियों के लिए दर्द भरा रहेगा क्योंकि न केवल इससे यातायात प्रभावित होता है बल्कि कुछ अराजक तत्वों द्वारा अनहोनी की आशंका भी रहती है। इससे पहले लालकिला और आईटीओ पर जो हंगामा हुआ था उसको देखकर दिल दहल उठता है। आज फिर उसी तरह का दौर दिखाई पड़ रहा है।

 किसानों को भी एक बात समझनी होगी कि सरकार जो फैसला ले रही है हो सकता है उसमें उसका हित हो और सरकार को भी एक बात समझनी होगी कि अगर किसान नहीं चाहता है तो क्यों नए कानून बनाए जा रहे हैं। कानून की आड़ में किसानों को डर है तो वह डर मत दिखाइए साहब। कुछ रास्ता निकालिए ताकि किसानों की भी बात रह जाए और सरकार का भी पक्ष आ जाये।

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