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कृषि कानूनों पर गठित समिति ने सुप्रीम कोर्ट को सीलबंद लिफाफे में सौंपी रिपोर्ट, 5 अप्रैल को होगी मामले की सुनवाई …

नई दिल्ली (पंकज यादव) । केंद्र सरकार द्वारा लाए गए तीनों कृषि विधेयकों का देशभर में विरोध हो रहा है। पंजाब- हरियाणा और उत्तर प्रदेश के किसान इस बिल के खिलाफ पिछले चार माह से सड़क पर आंदोलन कर रहे हैं। इस रस्सा-कस्सी को ध्यान में रखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने एक कमेटी का गठन कर रिपोर्ट मांगी थी। सुप्रीम कोर्ट की ओर से गठित समिति ने तीन नए कृषि कानूनों पर अपनी रिपोर्ट सौंप दी है। सीलबंद लिफाफे में सौंपी गई इस रिपोर्ट पर 5 अप्रैल को सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई होगी। समिति के एक सदस्य ने सुप्रीम कोर्ट को रिपोर्ट सौंपे जाने की पुष्टि की है, लेकिन यह नहीं बताया है कि इसमें क्या सिफारिशें की गई हैं। तीन सदस्यीय समिति के सदस्य और कृषि अर्थशास्त्री अनिल घनवात ने कहा, ‘सुप्रीम कोर्ट को सील बंद लिफाफे में 19 मार्च को यह रिपोर्ट सौंपी गई थी।’ बता दें कि सुप्रीम कोर्ट की ओर से कमिटी को रिपोर्ट सौंपने के लिए 20 मार्च तक का वक्त दिया गया था।

तीन नए कृषि कानूनों को लेकर पंजाब, हरियाणा और उत्तर प्रदेश समेत कई राज्यों के किसानों के विरोध के बाद सुप्रीम कोर्ट ने समिति का गठन किया था। रिपोर्ट तैयार करने के लिए इस समिति ने देश के 85 किसान संगठनों और उनसे जुड़े लोगों से बातचीत की थी। उम्मीद की जा रही है कि समिति की रिपोर्ट के बाद केंद्र सरकार और आंदोलनकारी किसानों के बीच गतिरोध टूटेगा और किसी एक बिंदु पर सहमति बन सकेगी। इस समिति में अशोक गुलाटी और प्रमोद जोशी को सदस्य के तौर पर शामिल किया गया है। इसी साल जनवरी में तीन नए कृषि कानूनों को लेकर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने इन्हें लागू करने पर रोक लगा दी थी।

इन तीन नए कानूनों को बीते साल सितंबर में संसद से मंजूरी मिली थी। किसानों और सरकार बीच वार्ताएं असफल रहने के बाद शीर्ष अदालत ने इस समिति के गठन को मंजूरी दी थी। हालांकि 40 किसान संगठनों के समूह संयुक्त किसान मोर्चा ने इसे खारिज कर दिया था और कहा था कि यह सरकार समर्थक है। किसान संगठनों का कहना है कि जब तक इन कानूनों को सरकार वापस नहीं लेगी, तब तक वह दिल्ली की सीमाओं पर डटे रहेंगे और आंदोलन को खत्म नहीं करेंगे। इसके अलावा किसानों की मांग है कि एमएसपी को कानूनी दर्जा देने के लिए एक कानून अलग से लाया जाना चाहिए।

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