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आख़िर कैसे …

 

अजनबी बनकर मिले

शहर में अपने

पहचान अपनी बताऊँ तो

बताऊँ कैसे

 

हाले दिल कुछ इस तरह

छुपाया

आप बीती सुनाऊँ तो

सुनाऊँ कैसे

 

जोश खोया चाल हुई फ़रेबी

कदम मिलाऊँ तो मिलाऊँ कैसे

 

क़समें वादे भूल बैठा जो

अंजुमन उसके लिए सजाऊँ तो

सजाऊँ कैसे

 

इकरार करके जो भुला हो

दास्ताँ याद उसे दिलाऊँ तो

दिलाऊँ कैसे

 

ख़फ़ा खुद से या तन्हा किया

महफ़िल ने

ये राज़ का राज़ पता लगाऊँ तो

लगाऊँ कैसे…!

 

 

©अनिता चंद, नई दिल्ली                 

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