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नर्मदा परिक्रमा मार्ग पर गुजरात का भरूच शहर जो विकसित होने के साथ ही बड़ा बंदरगाह भी है …

नर्मदा परिक्रमा भाग -16

अक्षय नामदेव । 25 मार्च 2021 गुरुवार तिथि एकादशी को शाम लगभग 4:00 बजे हम मीठी तलाई से रवाना हुए। लंबी समुद्री यात्रा पूरी होने के बाद हम पूरे आध्यात्मिक भाव से भरे हुए थे। मां नर्मदा की शक्ति को हमने निकट से महसूस किया। महसूस किया कि मां नर्मदा परिक्रमा वासी भक्तों के साथ पूरी परिक्रमा के दौरान साथ साथ रहती है तथा हर हाल में अपने भक्तों की रक्षा करती है। समुद्र में दिनभर धूप में तपने के बावजूद भी हमारा मन बहुत हल्का था। ” मुझे खुशी मिली इतनी कि मन में ना समाए, पलक बंद कर लूं कहीं छलक ही न जाए “। हम अब अमखेड़ा के रास्ते भरूच शहर में प्रवेश कर रहे थे।

मां नर्मदा के तट पर स्थित भरूच शहर गुजरात राज्य का बड़ा और विकसित शहर है। रेवा सागर संगम अर्थात खंभात की खाड़ी से लगे होने के कारण यह एक बड़ा बंदरगाह भी रहा है। वर्तमान में इसकी आबादी दो लाख के लगभग होगी। बड़ी चौड़ी फोरलेन सड़कें बड़े बड़े फ्लाई ओवर, बहुमंजिला इमारतें, फ्लैट्स कालोनियां और भारी वाहनों की रेलम पेल तथा सड़कों में पटी पड़ी भीड़ भरूच शहर की दास्तान स्वमेव बयां करती है। भरूच शहर नर्मदा तट का प्राचीन ऐतिहासिक पौराणिक शहर है। इसे भृगू क्षेत्र भी कहा जाता है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार महर्षि भृगु ने यहां निवास किया था तथा तपस्या की थी। राजा बलि ने 10 अश्वमेध यज्ञ यहां किए थे जिसका उल्लेख पुराणों में मिलता है। भृगू क्षेत्र में प्राचीन मंदिरों की लंबी श्रृंखला है। शंखोद्वार तीर्थ, गौतमेश्वर तीर्थ, दशाश्वमेध तीर्थ मां नर्मदा के तट पर स्थित है। नर्मदा तट पर ही सुंदरी तीर्थ ,धूत ताप तीर्थ, अरंडी तीर्थ, जालेश्वर तीर्थ, शालिग्राम तीर्थ, द्वादशादित्य तीर्थ, कपिलेश्वर तीर्थ, देव तीर्थ, हंस तीर्थ भास्कर तीर्थ भृगेश्वर तीर्थ नर्वदेश्वर तीर्थ मथुरेश्वर तीर्थ कोटेश्वर तीर्थ ब्रह्म तीर्थ क्षेत्रपाल तीर्थ सहित नर्मदा के तट पर बड़े ऐतिहासिक तीर्थ स्थित है। यदि आप इन सब तीर्थों का दर्शन करना चाहे तो भरूच में कम से कम 3 दिन का समय लेकर यहां रुक सकते हैं।

बिजली की चकाचौंध से भरे व्यस्ततम भरूच शहर पार करते करते हमें लगभग 8:00 बजने लगे। हमें महसूस हुआ कि हमें यही कहीं उचित जगह देखकर विश्राम करना चाहिए। इसके लिए हम भरूच शहर में स्थित दो अलग-अलग बड़े भव्य विशाल मंदिर आश्रम में जाकर संपर्क किया परंतु वहां के प्रबंधकों ने हमें बताया कि कोरोनावायरस के प्रभाव के कारण यहां लाक डाउन है तथा प्रशासन का निर्देश है कि किसी को भी रुकने ना दिया जाए। इस आशय के बोर्ड भी वहां टंगे मिले। यहां रुकने का कोई उचित आसरा ना देख अब हम भरूच शहर से बाहर की ओर निकलने लगे थे। भरूच शहर के बाहरी छोर में मुख्य मार्ग में खाने के लिए अच्छे होटलों की भरमार है। हम समझ चुके थे कि करोना वायरस के कारण हो सकता है हमें आगे भी रुकने को जगह ना मिले और हमें भोजन के लिए भी परेशान होना पड़ सकता है ऐसी स्थिति में हमने एक अच्छा साफ सुथरा होटल देख वहां भोजन करने का निर्णय किया। निरुपमा बिसेन चाची, चतुर्वेदी बहन, विद्या बहन एकादशी व्रत होने के कारण होटल में भोजन करने को तैयार नहीं हुई तथा साथ रखी हुई सुखी सामग्री ही खाना पसंद किया परंतु हम में से अनेक लोगों ने उस साफ-सुथरे होटल में काठियावाड़ी भोजन का आनंद लिया। गुजरातियों की पाक कला अपने आप में विशिष्ट है।

लगभग 1 घंटे वहां ठहरने के बाद हम रात लगभग 9:00 बजे आगे के लिए रवाना हो गए। हमारी नजर ऐसे सुरक्षित स्थान पर थी जहां हम रात्रि विश्राम कर सकें। अंततः हम रात्रि लगभग 10:30 बजे बड़ोदरा से 60 किलोमीटर दूर मां नर्मदा के तट पर स्थित नारेश्वर तीर्थ पहुंचे। यहां हमने नारेश्वर तीर्थ के रंग अवधूत आश्रम जाकर अपने परिक्रमा वासी होने का परिचय बताया। हमें वहां तुरंत ठहरने की जगह मिल गई। सड़क के एक ओर रंग अवधूत एवं उनके अनुयाई शिष्यों की समाधि मंदिर इत्यादि है जहां विधि विधान एवं उनके पंथ के अनुसार पूजा पाठ होता है तो सड़क के दूसरी ओर लगभग 2 एकड़ हिस्से में आश्रम लाइब्रेरी इत्यादि बनी हुई है जहां लोग आश्रय पाते हैं। वहां रंगअवधूत ट्रस्ट द्वारा एक चिकित्सालय भी संचालित है जो आम जनता को समर्पित है।हमें रात भर ठहरना था। एक हाल हमें मिल गया। हम सभी परिक्रमा वासी वहां रात्रि लगभग 11:00 बजे अपनी चटाई चद्दर वगैरह बिछाकर सोने लगे। हमें जल्दी नींद आ गई।

सुबह 6:00 बजे लगभग नींद खुली तो देखा कि सभी महिला परिक्रमावाशी उठ कर नर्मदा स्नान के लिए जा चुके हैं। मैं और राम निवास तिवारी भी कुछ देर बाद नर्मदा स्नान के लिए चले गए। आश्रम से दक्षिण दिशा की ओर लगभग आधा किलो मीटर पैदल ढलान उतरने के बाद हम नर्मदा तक पहुंच गए। वहां बिसेन चाची विद्यावती बहन चतुर्वेदी बहन निरुपमा मधु मेकला कल्पना स्नान कर मां नर्मदा के पूजन अर्चन में लगी हुई थी। हम मां नर्मदा में स्नान कर पूजन अर्चन किया और तट पर काफी देर रहे। तट पर वहां नाव चल रही थी। नर्मदा नदी के उस पार जाने वाले कामकाजी नौकरीपेशा लोग नाव में में अपनी मोटरसाइकिल, स्कूटर लेकर आ जा रहे थे। तिवारी ने वहां बैठे-बैठे अनेक लोगों से बातचीत कर परिचय प्राप्त किया। अपने जीवन का ज्यादातर समय तिवारी ने समाज को दिया है इसलिए उन्हें लोगों से संवाद बनाने में ज्यादा समय नहीं लगता है। काफी देर बैठे रहने के बाद हम नर्मदा तट से आश्रम वापस आ गए तथा रंग अवधूत की समाधि का दर्शन किया।

नारेश्वर तीर्थ रंग अवधूत की तपोभूमि है। वर्ष 1898 में गोधरा में जन्में रंग अवधूत 1925 में नारेश्वर आए थे। उन्होंने ही यहां विशाल आश्रम तैयार किया जो अब उनके ना रहने पर उनके अनुयाई संभाल रहे हैं। वहां आश्रम क्षेत्र का दर्शन करने के पश्चात हम 26 मार्च 2021 शुक्रवार को सुबह 10:00 बजे लगभग आगे की परिक्रमा के लिए निकल गए।

हर हर नर्मदे

 

 क्रमशः

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