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दिल्ली बुलेटिन

अब वक्त अपना नहीं

जो धरती को पकड़े रखते थे हाथों की मानिन्द कभी उम्र के धक्के से फिसलने लगे हैं वे पैर। टूटने लगे हैं अस्थि-पिंजर जो रखते थे लोहे की सलाखों को भी तोड़ने की हिम्मत। किसी ने कहा- “वक्त बदल गया” किसी ने कहा- “अब वक्त अपना नहीं” किसी ने कहा- …

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प्यारी ‘क’

तुम जब हँसती हो तो अपने होठों को कुछ ऐसे दबा लेती हो जैसे दवा की शीशी पर रबड़ का कोई ढक्कन। तुम्हारा एक हाथ हमेशा तुम्हारे बालों की एक लट पर ऐसे झूलता है जैसे मेहमानों के आने पर किसी के घर का सरसराता परदा।   ‘क’ मैंने एक …

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लौट आओ

तुम्हारे अँदर एक समुद्र है तुम उस समुद्र में लौट आओ । यह शहर कितना उदास , कितना सूना तुम्हारा मन कितना उचाट , असम्पृक्त अनकते स्पर्शों का वह नीला – झीना मधुरिम रंग नील – नील में समाहित सम्मोहित शाश्वत द्वार चिर – प्रतीक्षित …. गोधूलि से पहले कहीं …

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महानगर

कितनी विसंगतियो से भरा पडा है ये महानगर जगा रहता प्रहर प्रहर हरदब रहता है भरा लबालब उजाले से कभी बिजली कभी सुरज अँधयारे का हर कतरा ढूँढ लेता है जगह इन्सानो ह्रदय मस्तिष्क मे छुती आसमान इमारतें उतनी ही बौनी आती नजर इन्सानो की फितरते सुरज के सिने पे …

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सरकार और सरकारी

{व्यंग्य} हमारे देश में सरकारी कर्मचारी वो प्राणी होता है, जो खुद को सरकार का दामाद समझता है,जो अपनी खातिरदारी तो पूरी करवाना चाहता है और काम करना अपनी तौहीन समझता है। वक्त पर दफ्तर आने से जिसकी इज्जत कम होती है। दबाब में जल्दी आ भी गए तो अपनी …

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.कौवा मामा आम गिरावो

(बाल गीत)   .कौवा मामा आम गिरावो ,हम तुम दोनों खायेंगे   चलो बजार लायेंगे दुल्हन कोने में बैठाएंगे /   कौवा बैठा पेड़ पर फुलवा पहुंची दौड़ कर   बड़ी चाव से खड़ी निहारे देवता पुरखा सभी पुकारे   मनोभाव की सरबस मारआँखों से टपकती लार .   हाथ …

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