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और साल बीत गया …

गया साल कुछ खास ठीक नहीं था।
बहुत कुछ आम नहीं था।
कुछ मुश्किलों का तो नाम नहीं था।
सहन करना आसान नहीं था।
मगर सहन हो गया।
और साल बीत गया।

दोस्तो से, सगे सम्बन्धियों से
अक्सर मिलना होता नहीं था।
उन्हें हमारी चिंता नही थी
ऐसा तो होता नहीं था।
एक दूजे से बिन मिले ही
सुख दुख साझा होता था।
फ़ोन पर दुआ सलाम का
सिलसिला अक्सर होता था।
लम्बी बातें होती थी।
मिलने की अभिलाषा होती थी।
बिन मिले ही काम चल गया।
और साल बीत गया।

शादी ब्याह, जन्मदिवस का जश्न
अपनों की गैरहाजरी में मन गया।
आशीर्वादों का सिलसिला
वीडियो कॉल पर ही चल गया।
स्नेह से सिर पर हाथ रख कर,
अपनेपन से हाथ मिला कर,
सादर चरण स्पर्श कर,
भावविभोर हो झप्पी पा कर,
शुभकामनाएं देने का चलन
ना जाने कहाँ खो गया।
जश्न मनाने की चाह का
खजाना रीत गया।
और साल बीत गया।

बहुत कुछ अच्छा था।
अपनों का प्यार
उनका फिक्र करना सच्चा था।
जब घरों में बंद थे।
बाहर जाने पर पहरा था।
कोविड की चपेट में
डर बड़ा गहरा था।
तो दोस्तों का बड़ा सहारा था।
जरूरत की चीजें, दवाइयां
सब दरवाजे पर रखा मिलता था।
धन्यवाद कहने पर दोस्तों के नाराज होने का डर लगता था।
दूर होने पर भी
नजदीकियों का अहसास होता था।
अपनों का संसार करीब आ गया।
और साल बीत गया।

रात कितनी भी काली हो,
घना अंधेरा हो
आशाओं पर पहरा हो।
डर का माहौल पसरा हो।
मगर सूरज का निकलना लाज़मी है।
अंधरों की हार लाज़मी है
क़ुदरत का ये शाश्वत नियम
कितना कुछ सिखा गया।
खट्टी मीठी यादें दे गया।
और साल बीत गया।

ईश्वर से विनती है कि
नया नया साल खुशियां ही
खुशियां ले कर आए।
तमन्नाओं के पिटारों को
पूर्णरूप से भर जाए।
बीते बरस की याद न आए।
काश! ये दुआ कबूल हो जाये।
हर्ष ही हर्ष चंहु और नज़र आए।
2022 का ऐसा साल आए।
2022 का ऐसा साल आए।

 

@ओम सूयन, अहमदाबाद

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