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अमित अजीत जोगी ने मुख्यमंत्री को पत्र लिखकर पूछा- कोरोनाकाल में जब दारू दुकानें चल सकती हैं तो भर्ती प्रक्रिया क्यों नहीं?

रायपुर (गुणनिधि मिश्रा) । निगम मंडलों की अध्यक्षता बाँटने और नई दिल्ली में आला-अधिकारियों के आराम के लिए 60 करोड़ 40 लाख की लागत का छत्तीसगढ़ भवन बनाने के पहले सरकार को पिछले डेढ़ सालों से मजधार में अटकी 14,580 शिक्षकों और पिछले 3 साल से अधर में लटकी 48,761 जिला पुलिस बल के उम्मीदवारों की पदस्थापना करनी चाहिए। छत्तीसगढ़ के भविष्य के लिए निगम-मंडल अध्यक्ष और दिल्ली का छत्तीसगढ़ भवन से कहीं ज़्यादा शिक्षक और पुलिसकर्मी ज़रूरी हैं।

AICC महासचिव श्रीमती प्रियंका गांधी वाड्रा जी यूपी सरकार से परेशान हैं क्योंकि शिक्षकों की भर्ती को वहाँ उच्च न्यायालय ने स्टे (स्थगित) कर दिया है। लेकिन छत्तीसगढ़ में दोनों मामलों में कोई वैधानिक या न्यायिक अवरोध नहीं है। यहाँ वित्त मंत्री श्री भूपेश बघेल जी को 14580 शिक्षकों और 48,761 जिला पुलिस बल के उम्मीदवारों- जो अभी भी बेरोजगार हैं और पीड़ित हैं- की पदस्थापना के लिए सिर्फ एक हस्ताक्षर करने की आवश्यकता है। कांग्रेस को UP के बेरोज़गारों की चिंता के साथ-साथ छत्तीसगढ़ के भी बेरोज़गारों की चिंता करनी चाहिए।

बावजूद इसके हर मोड़ पर छत्तीसगढ़ सरकार ने छत्तीसगढ़ियों की नियमित भर्ती में अवरोध पैदा किया है और नौजवानों को अपने वैधानिक अधिकारों के लिए बेवजह संघर्ष करने के लिए मजबूर कर दिया है।

मैं और मेरे युवा साथी माननीय मुख्यमंत्री जी से पूछ रहे हैं कि जब कोरोनाकाल में शराब माफिया के दबाव में दारू दुकानें चल सकती हैं- यहाँ तक कि आउट्सॉर्सिंग से स्वीकृत नियमित पदों पर अस्थायी भर्तियाँ भी हो सकती हैं- तो स्वीकृत नियमित पदों में भर्ती प्रक्रिया क्यों नहीं?

इस विषय में मैं केवल 6 बिंदुओं पर सरकार का ध्यान आकृष्ट करूँगा:

  • 2019-20 और 2020-21 के बजट में सरकार द्वारा प्रदेश के लगभग 60000 ख़ाली पदों में 14580 नियमित शिक्षकों की भर्ती हेतु 7500 करोड़ राशि का आवंटन करने की घोषणा की गई थी। प्रदेश की जनता जानना चाहती है कि शिक्षकों की भर्ती के लिए आवंटित इतनी भारी भरकम राशि, और उसपर कमाए गए ब्याज, का डेढ़ साल बाद क्या हुआ? क्या उसे सरकार ने किसी अन्य मद जैसे मदिरा दुकान संचालन, ब्याज पर शुल्क इत्यादि में तो स्थानांतरित नहीं कर दिया और अगर ऐसा हुआ है, तो किस प्रावधान के अंतर्गत? अगर ऐसा वास्तव में हुआ है, तो ये केवल नियम विरुद्ध ही नहीं है बल्कि पड़ोसी राज्य मध्य प्रदेश के कुख्यात व्यापाम घोटाले को भी पीछे छोड़ देगा।
  • शिक्षक भर्ती शर्तों की कण्डिका 6 (3) में उल्लेख किया गया है कि ‘व्यापम से प्राप्त परीक्षाफल सूची, परीक्षाफल जारी होने के दिनांक से एक वर्ष तक वैध होगी।’ व्यापम ने विभिन्न पदों- क्रमशः व्यखाता शिक्षक, सहायक शिक्षक, शिक्षक, प्रयोगशाला शिक्षक, अंग्रेज़ी माध्यम शिक्षक और अंग्रेज़ी कला शिक्षक- पर परीक्षाफल सूची 1.10.19 से 21.11.19 तक जारी कर दी थी किंतु आज 9 महीने बीत जाने के बाद भी किसी को भी ज्वाइनिंग लेटर्स की पेशकश का कोई संकेत नहीं है। सरकार की असंवेदनशीलता के कारण वित्तीय तौर पर 7500 करोड़ की ये सम्पूर्ण राशि और वैधानिक तौर पर ये पूरी प्रक्रिया 3 महीनों में अवैधानिक और शून्य होने की कगार पर है।
  • 14580 नियमित शिक्षकों के उम्मीदवारों को ज्वाइनिंग लेटर्स न देकर उन्हें अधर में लटकाकर, सरकार ने चुपचाप 16.6.20 को इन नियमित पदों पर आउट्सॉर्सिंग के माध्यम से एडहॉक (अस्थायी) शिक्षकों को ‘बैक-डोर एंट्री’ से लेने के लिए जिला शिक्षा अधिकारियों के माध्यम से अलग-अलग विज्ञापन भी जारी कर दिए हैं। इस से सरकार की छत्तीसगढ़ियों-बेरोज़गारों के प्रति मंशा साफ़ है। ऐसे सभी विज्ञापनों को तत्काल प्रभाव से निरस्त करना चाहिए।
  • इसी प्रकार 3 सालों से अधर में लटकी 48,761 जिला पुलिस बल के उम्मीदवारों की भर्ती को ‘किसी भी हाल में 3 महीने में सम्पन्न करने’ के छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय के 24.2.20 के आदेश का सरकार ने अब तक पालन नहीं किया है। इस सम्बंध में पुलिस महानिदेशक श्री डी॰एम॰अवस्थी ने मुझे आश्वस्त किया है कि कोरोना के कारण भर्ती प्रक्रिया में विलम्ब हुआ है तथा 15.7.20 तक इसे फिर से शुरू करने की कोशिश होगी। ‪
  • 14580 नियमित शिक्षकों के पद के विरुद्ध 3,28,970 उम्मीदवारों से ₹400-500 प्रति आवेदन शुल्क से 13 करोड़ और लगभग 3 लाख पुलिस बल उम्मेदवारों से ₹200-250 प्रति आवेदन शुल्क से 7.5 करोड़ वसूल लिया गया (कुल आवेदन शुल्क: 20.50 करोड़) किंतु अभी तक किसी को भी पदस्थापना नहीं दी गई है। ₹2500 प्रति महीने बेरोज़गारी भत्ता का वादा करने वाली सरकार उलटा चिट फण्ड कम्पनी जैसे नौकरी देने के नाम पर गरीब छत्तीसगढ़ी नौजावनों को छलने का काम न करे।
  • छत्तीसगढ़ शासन में कार्यरत विद्या मितानों और अथिति शिक्षकों को भी संभवतः कोरोना का बताकर फ़रवरी 2020 से वेतन भुगतान नहीं किया जा रहा है जबकि सरकार ने सभी निजी संस्थाओं को वेतन भुगतान यथावत रखने के निर्देश दिए हैं। निवेदन है कि इनका भी बकाया भुगतान तत्काल करवाने का कष्ट करें।

कोरोना काल में पूरे विश्व की अर्थव्यवस्था को भारी नुक़सान हुआ है। ऐसे में प्रदेश के लाखों शिक्षित बेरोज़गारों को उनके रोज़गार के वैधानिक अधिकार से वंचित करना बेहद दुःखद है। उम्मीद है कि विषय की गम्भीरता को देखते हुए सरकार समुचित कार्यवाही करेगी।

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