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ओड़िया साहित्य के युग प्रवर्तक -फकीर मोहन सेनापति …

14 जनवरी, 1843 को उड़ीसा राज्य के बालासोर जिले जिले के मल्लिकशपुर में सुप्रसिद्ध उड़िया साहित्यकार फकीर मोहन सेनापति का जन्म हुआ। उनके पिता, लक्ष्मण चरण सेनापति और माता तुलसी देवी थी। बाल्य काल में उनके पिता-माता के अकाल निधन के बाद वृद्धा पितामही द्वारा फकीर मोहन का लालन-पालन हुआ।

बाल्य में इनका नाम था ब्रजमोहन। परन्तु पितृमातृहीन पौत्र को फकीर वेश में सजाकर उनका जीवन सम्हाला था शोक-संतप्तापितामही ने। तदनन्तर ब्रजमोहन सेनापति ‘फकीरमोहन सेनापति’ के नाम से परिचित हुए। फकीर मोहन सेनापति का जीवन त्रासदियों से भरा रहा। बाल्यावस्था में पिता-माता से विहीन, युवावस्था में पत्नी-हीन और परिणत उम्र में पुत्र से विच्छिन्न होकर फकीर मोहन भगवत्-भक्ति में लीन रहने लगे। गाँव की पाठशाला में पढ़कर उन्होंने व्यक्तिगत रूप से अध्ययन जारी रखा। तदुपरांत वे बालेश्वर की मिशन्‌ स्कूल में प्रधानशिक्षक बने। धीरे-धीरे अपनी सारस्वत साधना से प्रतिष्ठित हुए।

मातृ भाषा ओड़िआ की सुरक्षा की दृष्टि से उन्होंने साहित्य में एक विप्लवात्मक पदक्षेप लिया। उनके जीवन-काल में अनेक जंजाल और संघर्ष आये। परन्तु वे अविचलित होकर सब झेल गये। सबल आशावादी होकर उन्होंने अपना जीवन निर्वाह किया। बालेश्वर में उनका गृह-उद्यान “शान्ति-कानन” आज भी साहित्यप्रेमी जनों के लिए एक पवित्र स्थल के रूप में दर्शनीय है। उन्होंने उड़िया भाषा और साहित्य की विशिष्ट पहचान स्थापित करने में अग्रणी भूमिका निभाई। फकीर मोहन सेनापति को उड़िया राष्ट्रवाद और आधुनिक उड़िया साहित्य का जनक माना जाता है। उन्होंने 19 वीं और 20 वीं सदी की शुरुआत में उड़िया भाषा की प्रगति के लिए अपना जीवन समर्पित किया।

फकीर मोहन की कहानी वास्तव में उड़िया साहित्य के “पुनर्जागरण” की कहानी है। इसके अलावा वह एक समाज सुधारक और शिक्षक थे, जिन्होंने अपनी कलम का इस्तेमाल समाज में व्याप्त कुरीतियों की आलोचना और सुधार के लिए किया। उन्हें उड़िया कथा का जनक कहा जाता है।

उन्हें उपयुक्त रूप से उड़ीसा का थॉमस हार्डी कहा जाता है। 1897 और 1915 के बीच लिखे गए फकीरमोहन के चार उपन्यास अठारहवीं और उन्नीसवीं शताब्दी के दौरान उड़ीसा की सामाजिक-सांस्कृतिक स्थितियों को दर्शाते हैं। जबकि तीन उपन्यास-छहमाणआठगुंठ, मामून और प्रयाशीता इसके कई आयामों में सामाजिक जीवन की वास्तविकताओं को उजागर करते हैं। लछमा अठारहवीं शताब्दी के दौरान मराठा आक्रमणों के मद्देनजर उड़ीसा की अराजक स्थितियों से निपटने वाला एक ऐतिहासिक रोमांस है। उन्होंने कुछ यादगार लघु कथाएँ लिखी हैं, जैसे कि रेबती, पेटेंट मेडिसिन और रंदीपुआ अनंता’। फकीर मोहन उड़िया में पहली आत्मकथा, ‘आत्म जीवन चरित्र’ के लेखक भी हैं। फकीर मोहन की पहली मूल कविता उत्कल भ्रामणम ’(उड़ीसा का भ्रमण) 1892 में छपी। यह वास्तव में एक यात्रा पुस्तक नहीं है, बल्कि उड़ीसा के तत्कालीन सार्वजनिक जीवन में प्रमुख समकालीन व्यक्तित्वों का एक असामान्य और हास्यपूर्ण सर्वेक्षण है।

उनकी अन्य मौलिक कविताएँ पुष्पाला (द गारलैंड), उपाहार (उपहार), पूजा फूला (पूजा के फूल), प्रतिष्ठा (प्रार्थना) और धुली (डस्ट्रेगिन्स) हैं। फकीर मोहन सेनापति ने पूरी तरह एकल से ‘रामायण’ और ‘महाभारत’ का अनुवाद किया। रामायण ’और महाभारत’ का अनुवाद करने के लिए उन्हें उड़ीसा में ‘व्यासकवि’के नाम से जाना जाता है। उन्हें तत्कालीन सामंती राज्य, बामरा के राजा द्वारा ‘सरस्वती’ की उपाधि से सम्मानित किया गया था। एक महान प्रेमी और उड़िया साहित्य में नए युग के निर्माता, वे ‘उत्कल भाषा उन्नाव बिधनी सभा’ नामक एक संस्था के संस्थापक थे, जिसे 1867 में उड़ीसा के लोगों में एक नई जागरूकता पैदा करने और उड़िया भाषा का प्रचार करने के लिए शुरू किया गया था।

फकीर मोहन सेनापतिके साहित्य की तुलना हम हिंदी साहित्य की सुप्रसिद्ध कथाकार उपन्यासकार मुंशी प्रेमचंद के साहित्य से कर सकते हैं। दोनों ही लेकर भारत पीड़ित शोषित एवं पिछड़ी जनता का प्रतिनिधित्व अपने साथ में करते हैं। उनके पात्र देश की और आम जनता में से लिए गए हैं जिन्हें हम आज भी ग्रामीण इलाकों में देख सकते हैं। गांव की सामाजिक सांस्कृतिक परिवेश की झांकी दोनों की साहित्यकारों के साहित्य में परिलक्षित होती है। यदि भाषा से पति बात करें तो दोनों ही जनता के लेखक है जो आम बोलचाल की भाषा का प्रयोग करते हैं जिसमें कहीं भी लाक्षणिकताया किसी तरह का लाग-लपेट नहीं है। जिस स्पष्टवादिता के लिए मुंशी प्रेमचंद हिंदी साहित्य में अपना विशिष्ट स्थान रखते हैं कुछ वैसी ही स्थिति ओड़िआ साहित्य में फकीर मोहन सेनापति की लिखी जाती है। अपने साहित्यिक युग के प्रवर्तक रचनाकार के रूप में जो अतुलनीय योगदान प्रेमचंदजी का है।

उड़िया साहित्य के संदर्भ में फकीर मोहन सेनापति के लिए ऐसा कहना सर्वथा अनुचित न होगा। आदर्शोंन्मुख यथार्थवादी दृष्टिकोण दोनों साहित्यकारों के साहित्य में स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है। उड़ीसा के कई विश्वविद्यालयों में प्रेमचंद तथा फकीर मोहन सेनापति के साहित्य का तुलनात्मक अध्ययन किया गया है। इस पर शोध कार्य करने की अनेकानेक संभावनाएं व संकल्पनाएं हैं।

 

©मयूरी जोशी, पारादीप, ओडिशा

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