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हिंदी का रोना रोने वालों के लिए एक पोस्ट…

दरअसल समस्या भारतीयों विशेष रूप से हिंदी प्रयोग करने वालों में ज्यादा है। उनकी कथनी और करनी में ज्यादा फर्क है। उन्हें हर चीज सरकार से चाहिए। उनके लिए हिंदी केवल ‘यूज और थ्रो’ की भाषा रही है। उनकी पुरानी अदावत हैं।

दरअसल अंग्रेजी शासन की मानसिकता यह रही कि प्रत्येक देशी चीज़ को निकृष्ट मानो, हां यह अलग बात है कि साथ में चोरी से देशी चीजों का दोहन भी करों। आज़ादी मिलने के बाद भी हमारी सोच भी वही की रही। इसी सोच की उपज है अंग्रेजीवादी मानसिकता। यह एक सोच है। जो एक जहर के रूप में हमारी परंपरा, भाषा, सोच, व्यवस्था सभी कुछ को वैसाखी आधारित बना रही है।

यह समस्या अब ज्यादा विकराल हो रही है। क्योंकि जिस पीढ़ी ने आजादी की लड़ाई लड़ी, देखी, महसूस किया वह अब दिवंगत हो रहीं है। बाकियों के लिए हिंदी या अन्य पक्ष बेकार की बातें है। ऐसे में हमारी भाषा, परंपरा, विरासत के क्षय होने का डर है।

जरूरी है कि हम सब देशी भाषाओं के महत्व को समझे। अंग्रेजी सोच या अंग्रेजी जातिवाद का विरोध जरूरी है और सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण यह कि हिंदी संयुक्तराष्ट्र संघ से ज्यादा घरों में आए।

जय हिंद ! जय हिंदी!!

©डॉ साकेत सहाय, नई दिल्ली

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